ॐ जय जगदीश हरे
श्री जगदीश जी की आरती — सम्पूर्ण पाठ (अर्थ सहित)
"ॐ जय जगदीश हरे" भगवान विष्णु (जगदीश — जगत के स्वामी) की हिन्दी आरती है, जिसकी रचना पं. श्रद्धाराम फिल्लौरी ने लगभग १८७० में की थी; आज यह लगभग हर पूजा के अंत में गाई जाने वाली सबसे लोकप्रिय आरती है।
संपूर्ण पाठ
अर्थ एवं महत्व
इस आरती की रचना पंजाब के फिल्लौर में जन्मे विद्वान, कथावाचक और हिन्दी के आरंभिक उपन्यासकार पं. श्रद्धाराम शर्मा (फिल्लौरी) ने उन्नीसवीं सदी में की थी। सरल हिन्दी में लिखी यह आरती भगवान को माता-पिता, अन्तर्यामी परमात्मा, करुणा के सागर और दीनों के बन्धु के रूप में पुकारती है और भक्त की ओर से विनम्र स्वीकारोक्ति करती है कि वह मूर्ख और कुमति है, जिसे केवल प्रभु की कृपा ही पार लगा सकती है। अंतिम पद में विषय-विकार और पापों के नाश तथा श्रद्धा, भक्ति और सन्त-सेवा की वृद्धि की प्रार्थना है। मूलतः विष्णु को समर्पित होने पर भी यह आरती इतनी सार्वभौमिक हो गई है कि घरों और मन्दिरों में लगभग हर देवता की पूजा, सत्यनारायण कथा और त्योहारों के अंत में दीप घुमाते हुए इसे गाया जाता है।
लाभ
- पूजा, हवन, कथा या त्योहार के अंत में दीप-आरती के समय परंपरागत रूप से गाई जाती है।
- भक्त मानते हैं कि श्रद्धा से इसे गाने पर मन के दुःख और संकट दूर होते हैं — जैसा आरती स्वयं कहती है।
- सरल हिन्दी और सामूहिक धुन के कारण परिवार और बच्चे भी इसे आसानी से साथ गा सकते हैं।
- गुरुवार, एकादशी और सत्यनारायण पूजा पर इसका गायन विशेष शुभ माना जाता है।
पाठ विधि
पूजा के अंत में घी या कपूर का दीपक थाली में रखकर भगवान के सामने खड़े हों। आरती गाते हुए दीपक को घड़ी की सुई की दिशा में घुमाएँ — परंपरा में चरणों के सामने चार बार, नाभि के सामने दो बार, मुख के सामने एक बार और फिर पूरे विग्रह के चारों ओर सात बार। गायन के साथ शंख, घंटी या ताली बजाई जा सकती है; अंत में आरती की लौ पर हाथ घुमाकर उसे आँखों और सिर से लगाएँ।
सामान्य प्रश्न
- "ॐ जय जगदीश हरे" आरती किसने लिखी?
- इसकी रचना पं. श्रद्धाराम शर्मा फिल्लौरी (१८३७–१८८१) ने लगभग १८७० में की थी। वे पंजाब के फिल्लौर के विद्वान, कथावाचक और हिन्दी के आरंभिक उपन्यासकार थे।
- "जगदीश" का अर्थ क्या है?
- "जगदीश" दो शब्दों से बना है — "जगत" (संसार) और "ईश" (स्वामी)। अर्थात् संसार के स्वामी, जो यहाँ भगवान विष्णु (हरि) के लिए प्रयुक्त है।
- इस आरती में कितने पद हैं?
- आरती में आठ पद हैं — "ॐ जय जगदीश हरे" वाला आरंभिक पद और उसके बाद सात पद, जिनमें से हर एक के बाद टेक "ॐ जय जगदीश हरे" गाई जाती है। कई लोग अंत में पहला पद फिर से गाते हैं।
- क्या यह आरती केवल विष्णु जी के लिए है?
- मूल रूप से यह विष्णु जी की आरती है, पर आज इसे लगभग हर देवता की पूजा, सत्यनारायण कथा और त्योहारों के अंत में गाया जाता है, इसलिए इसे "सार्वभौमिक आरती" भी कहा जाता है।
- अलग-अलग पुस्तकों में कुछ पंक्तियाँ अलग क्यों मिलती हैं?
- लोक-प्रचलन में कुछ शब्द बदलते रहे हैं — जैसे "मैं मूरख फलकामी" की जगह "मैं मूरख खल कामी", या "ठाकुर तुम मेरे" की जगह "रक्षक तुम मेरे"। कई गायक अंत में "तन मन धन सब कुछ है तेरा" पंक्तियाँ भी जोड़ते हैं, जो सब संस्करणों में नहीं मिलतीं।