दुर्गा आरती (जय अम्बे गौरी)

माँ अम्बे जी की आरती (अर्थ सहित)

"जय अम्बे गौरी" माँ दुर्गा की सबसे लोकप्रिय आरती है, जिसके तेरह अंतरे देवी के रूप, उनके असुर-संहार और भक्तों पर उनकी कृपा का गुणगान करते हैं; इसे पूजा के अंत में, विशेषकर नवरात्रि में, दीपक घुमाते हुए गाया जाता है।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी। तुमको निशदिन ध्यावत, हरि ब्रह्मा शिवरी॥ जय अम्बे गौरी॥

    Jai Ambe Gaurī, maiyā jai Shyāmā Gaurī | Tumako nishadina dhyāvata, Hari Brahmā Shivarī || Jai Ambe Gaurī ||

    हे अम्बे गौरी, आपकी जय हो; हे मैया श्यामा गौरी, आपकी जय हो। विष्णु, ब्रह्मा और शिव दिन-रात आपका ध्यान करते हैं।

  2. मांग सिंदूर विराजत, टीको मृगमद को। उज्ज्वल से दोउ नैना, चंद्रवदन नीको॥ जय अम्बे गौरी॥

    Māṅga sindūra virājata, ṭīko mṛgamada ko | Ujjvala se dou nainā, chandravadana nīko || Jai Ambe Gaurī ||

    आपकी मांग में सिंदूर और माथे पर कस्तूरी का टीका शोभित है; आपके दोनों नेत्र उज्ज्वल हैं और चंद्रमा जैसा मुख अत्यंत सुंदर है।

  3. कनक समान कलेवर, रक्ताम्बर राजै। रक्तपुष्प गल माला, कंठन पर साजै॥ जय अम्बे गौरी॥

    Kanaka samāna kalevara, raktāmbara rājai | Raktapuṣhpa gala mālā, kaṇṭhana para sājai || Jai Ambe Gaurī ||

    आपका शरीर सोने के समान दमकता है और उस पर लाल वस्त्र शोभा देते हैं; गले में लाल फूलों की माला सुशोभित है।

  4. केहरि वाहन राजत, खड्ग खप्पर धारी। सुर-नर-मुनिजन सेवत, तिनके दुखहारी॥ जय अम्बे गौरी॥

    Kehari vāhana rājata, khaḍga khappara dhārī | Sura-nara-munijana sevata, tinake dukhahārī || Jai Ambe Gaurī ||

    आप सिंह पर विराजमान हैं और खड्ग तथा खप्पर धारण करती हैं; देवता, मनुष्य और मुनि आपकी सेवा करते हैं और आप उनके दुःख हर लेती हैं।

  5. कानन कुण्डल शोभित, नासाग्रे मोती। कोटिक चंद्र दिवाकर, सम राजत ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥

    Kānana kuṇḍala shobhita, nāsāgre motī | Koṭika chandra divākara, sama rājata jyotī || Jai Ambe Gaurī ||

    कानों में कुंडल और नाक के अग्रभाग में मोती शोभित है; आपकी ज्योति करोड़ों चंद्रमाओं और सूर्यों के समान दमकती है।

  6. शुंभ-निशुंभ बिदारे, महिषासुर घाती। धूम्र विलोचन नैना, निशदिन मदमाती॥ जय अम्बे गौरी॥

    Shumbha-Nishumbha bidāre, Mahiṣhāsura ghātī | Dhūmra vilochana nainā, nishadina madamātī || Jai Ambe Gaurī ||

    आपने शुम्भ-निशुम्भ को विदीर्ण किया और महिषासुर का वध किया; धूम्रलोचन का अंत करने वाले आपके नेत्र दिन-रात दिव्य मद से भरे रहते हैं।

  7. चण्ड-मुण्ड संहारे, शोणित बीज हरे। मधु-कैटभ दोउ मारे, सुर भयहीन करे॥ जय अम्बे गौरी॥

    Chaṇḍa-Muṇḍa sanhāre, Shoṇita Bīja hare | Madhu-Kaiṭabha dou māre, sura bhayahīna kare || Jai Ambe Gaurī ||

    आपने चण्ड और मुण्ड का संहार किया और रक्तबीज को नष्ट किया; मधु और कैटभ दोनों को मारकर देवताओं को निर्भय कर दिया।

  8. ब्रह्माणी, रुद्राणी, तुम कमला रानी। आगम निगम बखानी, तुम शिव पटरानी॥ जय अम्बे गौरी॥

    Brahmāṇī, Rudrāṇī, tuma Kamalā rānī | Āgama nigama bakhānī, tuma Shiva paṭarānī || Jai Ambe Gaurī ||

    आप ही ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला (लक्ष्मी) रानी हैं; आगम और निगम आपका बखान करते हैं और आप शिव की पटरानी हैं।

  9. चौंसठ योगिनी मंगल गावत, नृत्य करत भैरों। बाजत ताल मृदंगा, अरु बाजत डमरू॥ जय अम्बे गौरी॥

    Chauṁsaṭha yoginī mangala gāvata, nṛtya karata Bhairoṁ | Bājata tāla mṛdangā, aru bājata ḍamarū || Jai Ambe Gaurī ||

    चौंसठ योगिनियाँ मंगल-गीत गाती हैं और भैरव नृत्य करते हैं; ताल और मृदंग बजते हैं और साथ में डमरू भी बजता है।

  10. तुम ही जग की माता, तुम ही हो भरता। भक्तन की दुख हरता, सुख संपति करता॥ जय अम्बे गौरी॥

    Tuma hī jaga kī mātā, tuma hī ho bharatā | Bhaktana kī dukha haratā, sukha sampati karatā || Jai Ambe Gaurī ||

    आप ही जगत की माता हैं और आप ही उसका भरण-पोषण करती हैं; आप भक्तों के दुःख हरती हैं और सुख-संपत्ति देती हैं।

  11. भुजा चार अति शोभित, वर मुद्रा धारी। मनवांछित फल पावत, सेवत नर नारी॥ जय अम्बे गौरी॥

    Bhujā chāra ati shobhita, vara mudrā dhārī | Manavāñchhita phala pāvata, sevata nara nārī || Jai Ambe Gaurī ||

    आपकी चारों भुजाएँ अत्यंत शोभित हैं और आप वरद मुद्रा धारण करती हैं; आपकी सेवा करने वाले नर-नारी मनचाहा फल पाते हैं।

  12. कंचन थाल विराजत, अगर कपूर बाती। श्रीमालकेतु में राजत, कोटि रतन ज्योती॥ जय अम्बे गौरी॥

    Kañchana thāla virājata, agara kapūra bātī | Shrīmālaketu meṁ rājata, koṭi ratana jyotī || Jai Ambe Gaurī ||

    सोने के थाल में अगर, कपूर और बाती सजी है; श्रीमालकेतु में आपकी ज्योति करोड़ों रत्नों के समान दमकती है।

  13. श्री अंबेजी की आरती, जो कोई नर गावै। कहत शिवानंद स्वामी, सुख-संपति पावै॥ जय अम्बे गौरी॥

    Shrī Ambejī kī āratī, jo koī nara gāvai | Kahata Shivānanda Svāmī, sukha-sampati pāvai || Jai Ambe Gaurī ||

    शिवानंद स्वामी कहते हैं कि जो कोई श्री अम्बे जी की यह आरती गाता है, वह सुख और संपत्ति पाता है।

अर्थ एवं महत्व

"जय अम्बे गौरी" उत्तर भारत के घर-घर और देवी-मंदिरों में गाई जाने वाली दुर्गा जी की प्रमुख आरती है। अंतिम अंतरे में "कहत शिवानंद स्वामी" आता है, इसलिए परंपरा इसे शिवानंद स्वामी की रचना मानती है। आरती पहले माँ के श्रृंगार और तेजस्वी रूप का चित्र खींचती है, फिर शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और मधु-कैटभ के संहार का स्मरण कराती है, जो देवी माहात्म्य की कथाओं से जुड़े हैं। इसके बाद देवी को ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला के रूप में, जगत की माता और पालनहार के रूप में पहचाना जाता है। नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार की पूजा में, प्रायः दुर्गा चालीसा के बाद, इसे गाने की परंपरा है।

लाभ

  • भक्तों की मान्यता है कि श्रद्धा से आरती गाने पर पूजा पूर्ण होती है और माँ अम्बे की कृपा प्राप्त होती है।
  • नवरात्रि में सुबह और संध्या को यह आरती गाना परंपरागत रूप से अत्यंत शुभ माना जाता है।
  • सामूहिक आरती घर और मंदिर में भक्ति, एकता और उत्सव का वातावरण बनाती है।
  • अंतिम अंतरे के अनुसार आरती गाने वाले को सुख-संपत्ति मिलती है; भक्त इसे आस्था के रूप में मानते हैं।

पाठ विधि

पूजा के अंत में थाल में घी का दीपक या कपूर जलाएँ, साथ में फूल, अक्षत और प्रसाद रखें। घंटी बजाते हुए थाल को माँ की प्रतिमा के सामने घड़ी की दिशा में घुमाएँ और सब मिलकर आरती गाएँ। आरती के बाद दोनों हाथों से दीपक की लौ का स्पर्श कर आँखों और माथे से लगाएँ।

सामान्य प्रश्न

जय अम्बे गौरी आरती किसने लिखी?
अंतिम अंतरे में "कहत शिवानंद स्वामी" आता है, इसलिए परंपरा इसे शिवानंद स्वामी नामक भक्त-कवि की रचना मानती है।
इस आरती में कितने अंतरे हैं?
प्रचलित पाठ में तेरह अंतरे हैं, जिनमें पहला अंतरा ही टेक (मुखड़ा) है; अलग-अलग पुस्तकों में कुछ शब्दों का हल्का अंतर मिलता है।
श्यामा गौरी का क्या अर्थ है?
"गौरी" का अर्थ है गौर वर्ण वाली पार्वती और "श्यामा" का अर्थ है साँवले वर्ण वाली काली; दोनों नामों को साथ रखकर आरती यह भाव रखती है कि सौम्य और उग्र, दोनों रूप एक ही माँ के हैं।
दुर्गा आरती कब गानी चाहिए?
परंपरागत रूप से पूजा या चालीसा-पाठ के बाद, सुबह और संध्या को; नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार को इसका विशेष महत्व है।
क्या घर पर अकेले दुर्गा आरती कर सकते हैं?
हाँ, एक दीपक और श्रद्धा पर्याप्त मानी जाती है; परिवार के साथ गाना भी उतना ही प्रचलित है।