दुर्गा आरती (जय अम्बे गौरी)
माँ अम्बे जी की आरती (अर्थ सहित)
"जय अम्बे गौरी" माँ दुर्गा की सबसे लोकप्रिय आरती है, जिसके तेरह अंतरे देवी के रूप, उनके असुर-संहार और भक्तों पर उनकी कृपा का गुणगान करते हैं; इसे पूजा के अंत में, विशेषकर नवरात्रि में, दीपक घुमाते हुए गाया जाता है।
संपूर्ण पाठ
अर्थ एवं महत्व
"जय अम्बे गौरी" उत्तर भारत के घर-घर और देवी-मंदिरों में गाई जाने वाली दुर्गा जी की प्रमुख आरती है। अंतिम अंतरे में "कहत शिवानंद स्वामी" आता है, इसलिए परंपरा इसे शिवानंद स्वामी की रचना मानती है। आरती पहले माँ के श्रृंगार और तेजस्वी रूप का चित्र खींचती है, फिर शुम्भ-निशुम्भ, महिषासुर, चण्ड-मुण्ड, रक्तबीज और मधु-कैटभ के संहार का स्मरण कराती है, जो देवी माहात्म्य की कथाओं से जुड़े हैं। इसके बाद देवी को ब्रह्माणी, रुद्राणी और कमला के रूप में, जगत की माता और पालनहार के रूप में पहचाना जाता है। नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार की पूजा में, प्रायः दुर्गा चालीसा के बाद, इसे गाने की परंपरा है।
लाभ
- भक्तों की मान्यता है कि श्रद्धा से आरती गाने पर पूजा पूर्ण होती है और माँ अम्बे की कृपा प्राप्त होती है।
- नवरात्रि में सुबह और संध्या को यह आरती गाना परंपरागत रूप से अत्यंत शुभ माना जाता है।
- सामूहिक आरती घर और मंदिर में भक्ति, एकता और उत्सव का वातावरण बनाती है।
- अंतिम अंतरे के अनुसार आरती गाने वाले को सुख-संपत्ति मिलती है; भक्त इसे आस्था के रूप में मानते हैं।
पाठ विधि
पूजा के अंत में थाल में घी का दीपक या कपूर जलाएँ, साथ में फूल, अक्षत और प्रसाद रखें। घंटी बजाते हुए थाल को माँ की प्रतिमा के सामने घड़ी की दिशा में घुमाएँ और सब मिलकर आरती गाएँ। आरती के बाद दोनों हाथों से दीपक की लौ का स्पर्श कर आँखों और माथे से लगाएँ।
सामान्य प्रश्न
- जय अम्बे गौरी आरती किसने लिखी?
- अंतिम अंतरे में "कहत शिवानंद स्वामी" आता है, इसलिए परंपरा इसे शिवानंद स्वामी नामक भक्त-कवि की रचना मानती है।
- इस आरती में कितने अंतरे हैं?
- प्रचलित पाठ में तेरह अंतरे हैं, जिनमें पहला अंतरा ही टेक (मुखड़ा) है; अलग-अलग पुस्तकों में कुछ शब्दों का हल्का अंतर मिलता है।
- श्यामा गौरी का क्या अर्थ है?
- "गौरी" का अर्थ है गौर वर्ण वाली पार्वती और "श्यामा" का अर्थ है साँवले वर्ण वाली काली; दोनों नामों को साथ रखकर आरती यह भाव रखती है कि सौम्य और उग्र, दोनों रूप एक ही माँ के हैं।
- दुर्गा आरती कब गानी चाहिए?
- परंपरागत रूप से पूजा या चालीसा-पाठ के बाद, सुबह और संध्या को; नवरात्रि, माता की चौकी, जागरण और शुक्रवार को इसका विशेष महत्व है।
- क्या घर पर अकेले दुर्गा आरती कर सकते हैं?
- हाँ, एक दीपक और श्रद्धा पर्याप्त मानी जाती है; परिवार के साथ गाना भी उतना ही प्रचलित है।