जगन्नाथ रथ यात्रा
पुरी की रथ यात्रा — भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की गुंडिचा-यात्रा
जगन्नाथ रथ यात्रा की अगली संग्रहित तिथि सोमवार, 5 जुलाई 2027 है। नीचे स्थान, परंपरा और स्रोत देखें; स्थानीय समय की पुष्टि करें।
संपादकीय परिचय — अद्यतन: 10 अक्टूबर 2026
इस परिचय में दी गई वर्ष-संबंधी जानकारी उस अद्यतन की है। आगामी तिथि के लिए ऊपर का उत्तर और नीचे की तिथि-सूची देखें।
अगली जगन्नाथ रथ यात्रा सोमवार, 5 जुलाई 2027 को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया पर पुरी (ओडिशा) में निकलेगी; 2026 में यह गुरुवार, 16 जुलाई को थी। इस दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा तीन विशाल रथों पर सवार होकर श्रीमंदिर से गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं।
जगन्नाथ रथ यात्रा कब है? — तिथियाँ
ये संग्रहित पर्व-तिथियाँ हैं। स्थानीय समय और अलग परंपराओं में अंतर संभव है; नीचे हर तिथि के संदर्भ देखें।
| तिथि (तारीख) | पर्व / तिथि |
|---|---|
सोमवार, 5 जुलाई 2027 आगामी स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली कैलेंडर का संदर्भ; पुरी मंदिर की तिथि की पुष्टि शेष उद्धृत कैलेंडर की पर्व-तिथि; स्थानीय परंपरा देखें इस तिथि का दर्ज स्रोत-मिलान अभी शेष है। | आषाढ़ शुक्ल द्वितीया |
गुरुवार, 16 जुलाई 2026 स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली कैलेंडर का संदर्भ; पुरी मंदिर की तिथि की पुष्टि शेष उद्धृत कैलेंडर की पर्व-तिथि; स्थानीय परंपरा देखें इस तिथि का दर्ज स्रोत-मिलान अभी शेष है। | आषाढ़ शुक्ल द्वितीया |
जगन्नाथ रथ यात्रा क्यों मनाया जाता है?
भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु — विशेषकर श्रीकृष्ण — का स्वरूप माना जाता है। पुरी का श्रीजगन्नाथ मंदिर चार धामों में से एक है, जहाँ वे अपने बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। उनकी काष्ठ-प्रतिमाएँ, बड़ी गोल आँखों वाली, भारतीय मूर्तिकला में अनूठी हैं।
रथ यात्रा उन विरले अवसरों में सबसे प्रसिद्ध है जब भगवान स्वयं गर्भगृह से बाहर आकर सभी भक्तों को दर्शन देते हैं — चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या पंथ के हों। परंपरा के अनुसार तीनों देवता गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं, जिसे भगवान का उद्यान-गृह माना जाता है और जिसका नाम राजा इन्द्रद्युम्न की रानी गुंडिचा से जोड़ा जाता है, जिन्हें मंदिर-स्थापना की कथा में स्मरण किया जाता है।
भक्तों की मान्यता है कि रथ की रस्सी खींचना या रथ पर विराजे भगवान के दर्शन करना अत्यंत पुण्यदायी है। पुरी के गजपति राजा द्वारा सोने की झाड़ू से रथों को बुहारने की "छेरा पहँरा" रस्म यह संदेश देती है कि भगवान के सामने राजा भी सेवक है।
यह पर्व ओडिशा की संस्कृति का केंद्र है और आज अहमदाबाद, कोलकाता सहित भारत और विश्व के अनेक नगरों में भी रथ यात्राएँ निकाली जाती हैं।
पूजा विधि
1. स्नान पूर्णिमा: ज्येष्ठ पूर्णिमा को तीनों देवताओं को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है। मान्यता है कि इसके बाद वे "अस्वस्थ" हो जाते हैं।
2. अनसर (अनवसर): लगभग पंद्रह दिनों तक मुख्य दर्शन बंद रहते हैं और देवताओं की औषधीय सेवा की जाती है; इस अवधि में भक्त पट्टचित्र के दर्शन करते हैं।
3. नवयौवन दर्शन / नेत्रोत्सव: रथ यात्रा से एक दिन पहले देवता नवयौवन रूप में पुनः दर्शन देते हैं।
4. रथ यात्रा (आषाढ़ शुक्ल द्वितीया): "पहँडी" में देवताओं को झूलते-झूमते रथों तक लाया जाता है, गजपति राजा छेरा पहँरा करते हैं, और फिर हज़ारों भक्त रस्सियाँ खींचकर रथों को लगभग तीन किलोमीटर दूर गुंडिचा मंदिर तक ले जाते हैं।
5. गुंडिचा प्रवास और हेरा पंचमी: देवता गुंडिचा मंदिर में कुछ दिन रहते हैं। हेरा पंचमी पर देवी लक्ष्मी, भगवान के लौटने में देर पर रूठकर, गुंडिचा तक आती हैं — यह लीला बड़े चाव से मनाई जाती है।
6. बहुड़ा यात्रा और सुना बेश: आषाढ़ शुक्ल दशमी के आसपास देवता रथों पर लौटते हैं (बहुड़ा यात्रा); अगले दिन रथों पर स्वर्ण-आभूषणों से सुना बेश होता है, फिर अधरपणा और नीलाद्रि बिजे के साथ वे श्रीमंदिर में पुनः प्रवेश करते हैं।
घर पर: जो भक्त पुरी नहीं जा सकते, वे इस दिन भगवान जगन्नाथ या श्रीकृष्ण के चित्र का पूजन कर, खिचड़ी या मीठे भोग का अर्पण कर, "ॐ जय जगदीश हरे" आरती गाकर और स्थानीय रथ यात्रा में भाग लेकर पर्व मनाते हैं।
परंपराएँ एवं अनुष्ठान
- तीन रथ: भगवान जगन्नाथ का नंदीघोष (16 पहिए), बलभद्र का तालध्वज (14 पहिए) और सुभद्रा का दर्पदलन (12 पहिए); रथ हर वर्ष नए बनाए जाते हैं।
- पहँडी बिजे: घंटों, शंखों और कीर्तन के बीच देवताओं को झूलती चाल में मंदिर से रथों तक लाया जाता है।
- छेरा पहँरा: पुरी के गजपति राजा सोने की मूठ वाली झाड़ू से रथों को बुहारते हैं और चंदन-जल छिड़कते हैं।
- रथ खींचना: हज़ारों भक्त मोटी रस्सियों से रथों को बड़दांड (ग्रांड रोड) पर गुंडिचा मंदिर तक खींचते हैं।
- 2026 में रथ यात्रा 16 जुलाई, बहुड़ा यात्रा 24 जुलाई और सुना बेश 25 जुलाई को हुआ।
सामान्य प्रश्न
- जगन्नाथ रथ यात्रा 2027 कब है?
- जगन्नाथ रथ यात्रा 2027 सोमवार, 5 जुलाई को आषाढ़ शुक्ल द्वितीया पर है। पिछली रथ यात्रा गुरुवार, 16 जुलाई 2026 को हुई थी। पुरी में अनुष्ठानों का सटीक समय श्रीजगन्नाथ मंदिर प्रशासन घोषित करता है।
- रथ यात्रा के तीन रथों के नाम क्या हैं?
- भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष (16 पहिए), बलभद्र का तालध्वज (14 पहिए) और देवी सुभद्रा का दर्पदलन (12 पहिए) कहलाता है। यात्रा में सबसे आगे तालध्वज, फिर दर्पदलन और अंत में नंदीघोष चलता है।
- रथ यात्रा से पहले भगवान जगन्नाथ "बीमार" क्यों पड़ते हैं?
- परंपरा के अनुसार ज्येष्ठ पूर्णिमा (स्नान पूर्णिमा) को 108 घड़ों के जल से स्नान के बाद देवताओं को ज्वर हो जाता है। लगभग पंद्रह दिन के इस अनसर काल में मुख्य दर्शन बंद रहते हैं और उन्हें औषधीय भोग दिया जाता है। यह परंपरा भगवान को परिवार के सदस्य की तरह सेवा देने के भाव को दर्शाती है।
- छेरा पहँरा क्या है?
- छेरा पहँरा रथ यात्रा की वह रस्म है जिसमें पुरी के गजपति राजा सोने की मूठ वाली झाड़ू से तीनों रथों को बुहारते हैं और चंदन-जल छिड़कते हैं। यह दर्शाता है कि भगवान जगन्नाथ के सामने राजा भी एक विनम्र सेवक है। यह रस्म यात्रा के दौरान दोनों दिशाओं में होती है।
- भगवान जगन्नाथ गुंडिचा मंदिर में कितने दिन रहते हैं?
- देवता प्रायः लगभग एक सप्ताह गुंडिचा मंदिर में रहते हैं और आषाढ़ शुक्ल दशमी के आसपास बहुड़ा यात्रा में लौटते हैं; पूरा उत्सव लगभग नौ दिन का माना जाता है। उदाहरण के लिए 2026 में रथ यात्रा 16 जुलाई और बहुड़ा यात्रा 24 जुलाई को हुई।
- क्या कोई भी रथ यात्रा में भाग ले सकता है?
- हाँ। रथ यात्रा सार्वजनिक मार्ग पर होती है और कोई भी भक्त दर्शन कर सकता है तथा रथ की रस्सी खींचने में भाग ले सकता है। ध्यान दें कि पुरी के श्रीमंदिर के भीतर प्रवेश की अपनी परंपरागत नियमावली है, इसलिए रथ यात्रा को सभी के लिए भगवान के दर्शन का विशेष अवसर माना जाता है। भीड़ अत्यधिक होती है, अतः प्रशासन के निर्देशों का पालन करें।