विष्णु सहस्रनाम

श्री विष्णु सहस्रनाम स्तोत्रम् — सम्पूर्ण १०८ श्लोक (अर्थ सहित)

विष्णु सहस्रनाम भगवान विष्णु के एक हज़ार नामों का संस्कृत स्तोत्र है, जो महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह द्वारा युधिष्ठिर को सुनाया गया है; इसके १०८ श्लोक भक्त शान्ति, रक्षा और भक्ति के लिए नित्य पढ़ते हैं।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम्। प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये॥

    Shuklāmbaradharaṃ viṣhṇuṃ shashivarṇaṃ chaturbhujam | Prasannavadanaṃ dhyāyet sarvavighnopashāntaye ||

    श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चन्द्रमा के समान उज्ज्वल, चार भुजाओं वाले और प्रसन्नमुख भगवान विष्णु का मैं सब विघ्नों की शान्ति के लिए ध्यान करता हूँ।

  2. विश्वं विष्णुर्वषट्कारो भूतभव्यभवत्प्रभुः। भूतकृद्भूतभृद्भावो भूतात्मा भूतभावनः॥

    Vishvaṃ viṣhṇurvaṣhaṭkāro bhūtabhavyabhavatprabhuḥ | Bhūtakṛdbhūtabhṛdbhāvo bhūtātmā bhūtabhāvanaḥ ||

    वे स्वयं विश्व हैं, सर्वव्यापी विष्णु हैं, यज्ञ में 'वषट्' से आहूत होने वाले हैं और भूत, भविष्य व वर्तमान के स्वामी हैं। वे प्राणियों के रचयिता, पालक, उनकी सत्ता, उनकी आत्मा और उन्हें बढ़ाने वाले हैं।

  3. पूतात्मा परमात्मा च मुक्तानां परमा गतिः। अव्ययः पुरुषः साक्षी क्षेत्रज्ञोऽक्षर एव च॥

    Pūtātmā paramātmā cha muktānāṃ paramā gatiḥ | Avyayaḥ puruṣhaḥ sākṣhī kṣhetrajño'kṣhara eva cha ||

    वे पवित्र आत्मा और परमात्मा हैं, मुक्त पुरुषों की परम गति हैं। वे अविनाशी, पुरुष, साक्षी, क्षेत्रज्ञ (शरीर रूपी क्षेत्र को जानने वाले) और अक्षर हैं।

  4. योगो योगविदां नेता प्रधानपुरुषेश्वरः। नारसिंहवपुः श्रीमान् केशवः पुरुषोत्तमः॥

    Yogo yogavidāṃ netā pradhānapuruṣheshvaraḥ | Nārasiṃhavapuḥ shrīmān keshavaḥ puruṣhottamaḥ ||

    वे स्वयं योग हैं और योगवेत्ताओं के नेता हैं, प्रकृति और पुरुष के ईश्वर हैं। उन्होंने नृसिंह रूप धारण किया; वे श्रीमान, केशव और पुरुषोत्तम हैं।

  5. सर्वः शर्वः शिवः स्थाणुर्भूतादिर्निधिरव्ययः। सम्भवो भावनो भर्ता प्रभवः प्रभुरीश्वरः॥

    Sarvaḥ sharvaḥ shivaḥ sthāṇurbhūtādirnidhiravyayaḥ | Sambhavo bhāvano bhartā prabhavaḥ prabhurīshvaraḥ ||

    वे सर्वस्वरूप, संहारक (शर्व), मंगलमय (शिव) और स्थिर (स्थाणु) हैं; भूतों के आदि कारण और अक्षय निधि हैं। वे स्वेच्छा से प्रकट होने वाले, सबके भरण-पोषण करने वाले, उत्पत्ति-स्थान, प्रभु और ईश्वर हैं।

  6. स्वयम्भूः शम्भुरादित्यः पुष्कराक्षो महास्वनः। अनादिनिधनो धाता विधाता धातुरुत्तमः॥

    Svayambhūḥ shambhurādityaḥ puṣhkarākṣho mahāsvanaḥ | Anādinidhano dhātā vidhātā dhāturuttamaḥ ||

    वे स्वयम्भू, कल्याणदाता शम्भु, आदित्य, कमलनयन और महान नाद वाले हैं। आदि-अन्त से रहित वे धाता, विधाता और सर्वश्रेष्ठ आधार हैं।

  7. अप्रमेयो हृषीकेशः पद्मनाभोऽमरप्रभुः। विश्वकर्मा मनुस्त्वष्टा स्थविष्ठः स्थविरो ध्रुवः॥

    Aprameyo hṛṣhīkeshaḥ padmanābho'maraprabhuḥ | Vishvakarmā manustvaṣhṭā sthaviṣhṭhaḥ sthaviro dhruvaḥ ||

    वे अप्रमेय, इन्द्रियों के स्वामी हृषीकेश, नाभि में कमल धारण करने वाले पद्मनाभ और देवताओं के प्रभु हैं। वे विश्वकर्मा, मनु, त्वष्टा, अत्यन्त विशाल, सनातन और ध्रुव (अचल) हैं।

  8. अग्राह्यः शाश्वतः कृष्णो लोहिताक्षः प्रतर्दनः। प्रभूतस्त्रिककुब्धाम पवित्रं मङ्गलं परम्॥

    Agrāhyaḥ shāshvataḥ kṛṣhṇo lohitākṣhaḥ pratardanaḥ | Prabhūtastrikakubdhāma pavitraṃ maṅgalaṃ param ||

    वे इन्द्रियों से अग्राह्य, शाश्वत, कृष्ण, लाल नेत्रों वाले और प्रलय में संहार करने वाले हैं। वे ऐश्वर्य से परिपूर्ण, तीनों दिशाओं-लोकों के आधार, पवित्र और परम मंगल हैं।

  9. ईशानः प्राणदः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठः प्रजापतिः। हिरण्यगर्भो भूगर्भो माधवो मधुसूदनः॥

    Īshānaḥ prāṇadaḥ prāṇo jyeṣhṭhaḥ shreṣhṭhaḥ prajāpatiḥ | Hiraṇyagarbho bhūgarbho mādhavo madhusūdanaḥ ||

    वे ईशान, प्राणदाता और स्वयं प्राण हैं; ज्येष्ठ, श्रेष्ठ और प्रजापति हैं। वे हिरण्यगर्भ, पृथ्वी को अपने गर्भ में धारण करने वाले, लक्ष्मीपति माधव और मधु दैत्य का वध करने वाले मधुसूदन हैं।

  10. ईश्वरो विक्रमी धन्वी मेधावी विक्रमः क्रमः। अनुत्तमो दुराधर्षः कृतज्ञः कृतिरात्मवान्॥

    Īshvaro vikramī dhanvī medhāvī vikramaḥ kramaḥ | Anuttamo durādharṣhaḥ kṛtajñaḥ kṛtirātmavān ||

    वे ईश्वर, पराक्रमी, धनुर्धारी, मेधावी, विक्रम (लोकों को लाँघने वाले) और क्रम (सर्वत्र व्याप्त) हैं। वे सर्वोत्तम, अजेय, कृतज्ञ, कर्मरूप और आत्मनिष्ठ हैं।

  11. सुरेशः शरणं शर्म विश्वरेताः प्रजाभवः। अहः संवत्सरो व्यालः प्रत्ययः सर्वदर्शनः॥

    Sureshaḥ sharaṇaṃ sharma vishvaretāḥ prajābhavaḥ | Ahaḥ saṃvatsaro vyālaḥ pratyayaḥ sarvadarshanaḥ ||

    वे देवताओं के स्वामी, शरणदाता, परमानन्दस्वरूप, विश्व के बीज और प्रजा के उत्पत्ति-स्थान हैं। वे दिन और संवत्सर हैं, सर्प के समान पकड़ में न आने वाले, ज्ञानस्वरूप और सबको देखने वाले हैं।

  12. अजः सर्वेश्वरः सिद्धः सिद्धिः सर्वादिरच्युतः। वृषाकपिरमेयात्मा सर्वयोगविनिःसृतः॥

    Ajaḥ sarveshvaraḥ siddhaḥ siddhiḥ sarvādirachyutaḥ | Vṛṣhākapirameyātmā sarvayogaviniḥsṛtaḥ ||

    वे अजन्मा, सर्वेश्वर, सिद्ध, सिद्धिस्वरूप, सबके आदि और कभी च्युत न होने वाले अच्युत हैं। वे धर्म और वराह रूप वाले वृषाकपि, अमेय आत्मा वाले और सब बन्धनों से अलग हैं।

  13. वसुर्वसुमनाः सत्यः समात्माऽसम्मितः समः। अमोघः पुण्डरीकाक्षो वृषकर्मा वृषाकृतिः॥

    Vasurvasumanāḥ satyaḥ samātmā'sammitaḥ samaḥ | Amoghaḥ puṇḍarīkākṣho vṛṣhakarmā vṛṣhākṛtiḥ ||

    वे सबमें बसने वाले वसु, उदार मन वाले, सत्यस्वरूप, सबमें समान आत्मा वाले, असीम और सम हैं। वे अमोघ, कमलनयन पुण्डरीकाक्ष हैं; उनके कर्म और स्वरूप दोनों धर्ममय हैं।

  14. रुद्रो बहुशिरा बभ्रुर्विश्वयोनिः शुचिश्रवाः। अमृतः शाश्वतस्थाणुर्वरारोहो महातपाः॥

    Rudro bahushirā babhrurvishvayoniḥ shuchishravāḥ | Amṛtaḥ shāshvatasthāṇurvarāroho mahātapāḥ ||

    वे रुद्र, अनेक सिरों वाले, भरण करने वाले बभ्रु, विश्व की योनि और पवित्र कीर्ति वाले हैं। वे अमृत, शाश्वत-स्थाणु, श्रेष्ठ आरोहण-स्थान (परम पद) और महान तपस्वी हैं।

  15. सर्वगः सर्वविद्भानुर्विष्वक्सेनो जनार्दनः। वेदो वेदविदव्यङ्गो वेदाङ्गो वेदवित् कविः॥

    Sarvagaḥ sarvavidbhānurviṣhvakseno janārdanaḥ | Vedo vedavidavyaṅgo vedāṅgo vedavit kaviḥ ||

    वे सर्वत्र जाने वाले, सर्वज्ञ, सूर्य के समान प्रकाशमान, विष्वक्सेन और जनार्दन हैं। वे वेद, वेदवेत्ता, पूर्ण अंगों वाले, वेद जिनके अंग हैं ऐसे वेदांग और क्रान्तदर्शी कवि हैं।

  16. लोकाध्यक्षः सुराध्यक्षो धर्माध्यक्षः कृताकृतः। चतुरात्मा चतुर्व्यूहश्चतुर्दंष्ट्रश्चतुर्भुजः॥

    Lokādhyakṣhaḥ surādhyakṣho dharmādhyakṣhaḥ kṛtākṛtaḥ | Chaturātmā chaturvyūhashchaturdaṃṣhṭrashchaturbhujaḥ ||

    वे लोकों, देवताओं और धर्म के अध्यक्ष हैं तथा कृत और अकृत (कार्य-कारण) दोनों हैं। वे चार आत्मरूपों और चार व्यूहों वाले, चार दाढ़ों वाले और चतुर्भुज हैं।

  17. भ्राजिष्णुर्भोजनं भोक्ता सहिष्णुर्जगदादिजः। अनघो विजयो जेता विश्वयोनिः पुनर्वसुः॥

    Bhrājiṣhṇurbhojanaṃ bhoktā sahiṣhṇurjagadādijaḥ | Anagho vijayo jetā vishvayoniḥ punarvasuḥ ||

    वे तेजस्वी, भोग्य और भोक्ता, सहनशील तथा जगत के आदि में प्रकट होने वाले हैं। वे निष्पाप, विजय, विजेता, विश्वयोनि और बार-बार शरीरों में वास करने वाले पुनर्वसु हैं।

  18. उपेन्द्रो वामनः प्रांशुरमोघः शुचिरूर्जितः। अतीन्द्रः सङ्ग्रहः सर्गो धृतात्मा नियमो यमः॥

    Upendro vāmanaḥ prāṃshuramoghaḥ shuchirūrjitaḥ | Atīndraḥ saṅgrahaḥ sargo dhṛtātmā niyamo yamaḥ ||

    वे उपेन्द्र, वामन, विशालकाय प्रांशु, अमोघ, पवित्र और बलशाली हैं। वे इन्द्र से भी बढ़कर, प्रलय में सबका संग्रह करने वाले, सृष्टिरूप, धृतात्मा, नियम और यम (अन्तर्यामी नियन्ता) हैं।

  19. वेद्यो वैद्यः सदायोगी वीरहा माधवो मधुः। अतीन्द्रियो महामायो महोत्साहो महाबलः॥

    Vedyo vaidyaḥ sadāyogī vīrahā mādhavo madhuḥ | Atīndriyo mahāmāyo mahotsāho mahābalaḥ ||

    वे जानने योग्य, सब विद्याओं के ज्ञाता, सदा योगी, असुर-वीरों का वध करने वाले, माधव और मधु (मधुरस्वरूप) हैं। वे इन्द्रियातीत, महामायावी, महान उत्साही और महाबली हैं।

  20. महाबुद्धिर्महावीर्यो महाशक्तिर्महाद्युतिः। अनिर्देश्यवपुः श्रीमानमेयात्मा महाद्रिधृक्॥

    Mahābuddhirmahāvīryo mahāshaktirmahādyutiḥ | Anirdeshyavapuḥ shrīmānameyātmā mahādridhṛk ||

    वे महाबुद्धि, महावीर्य, महाशक्ति और महाद्युति से सम्पन्न हैं। उनका रूप अवर्णनीय है; वे श्रीमान, अमेयात्मा और मन्दराचल/गोवर्धन जैसे महान पर्वत को धारण करने वाले हैं।

  21. महेष्वासो महीभर्ता श्रीनिवासः सतां गतिः। अनिरुद्धः सुरानन्दो गोविन्दो गोविदां पतिः॥

    Maheṣhvāso mahībhartā shrīnivāsaḥ satāṃ gatiḥ | Aniruddhaḥ surānando govindo govidāṃ patiḥ ||

    वे महान धनुष धारण करने वाले, पृथ्वी के भर्ता, लक्ष्मी के निवास श्रीनिवास और सज्जनों की गति हैं। वे अनिरुद्ध, देवताओं को आनन्द देने वाले, गोविन्द और वेदवेत्ताओं के स्वामी हैं।

  22. मरीचिर्दमनो हंसः सुपर्णो भुजगोत्तमः। हिरण्यनाभः सुतपाः पद्मनाभः प्रजापतिः॥

    Marīchirdamano haṃsaḥ suparṇo bhujagottamaḥ | Hiraṇyanābhaḥ sutapāḥ padmanābhaḥ prajāpatiḥ ||

    वे तेजस्वी किरण (मरीचि), दुष्टों का दमन करने वाले, हंस, सुपर्ण (गरुड़) और सर्पों में श्रेष्ठ (शेष) हैं। वे हिरण्यनाभ, उत्तम तपस्वी, पद्मनाभ और प्रजापति हैं।

  23. अमृत्युः सर्वदृक् सिंहः सन्धाता सन्धिमान् स्थिरः। अजो दुर्मर्षणः शास्ता विश्रुतात्मा सुरारिहा॥

    Amṛtyuḥ sarvadṛk siṃhaḥ sandhātā sandhimān sthiraḥ | Ajo durmarṣhaṇaḥ shāstā vishrutātmā surārihā ||

    वे मृत्युरहित, सर्वद्रष्टा, सिंह, जोड़ने वाले सन्धाता, फलों में स्थित सन्धिमान और स्थिर हैं। वे अजन्मा, दुस्सह, शासक, विख्यात आत्मा वाले और देवशत्रुओं का संहार करने वाले हैं।

  24. गुरुर्गुरुतमो धाम सत्यः सत्यपराक्रमः। निमिषोऽनिमिषः स्रग्वी वाचस्पतिरुदारधीः॥

    Gururgurutamo dhāma satyaḥ satyaparākramaḥ | Nimiṣho'nimiṣhaḥ sragvī vāchaspatirudāradhīḥ ||

    वे गुरु, गुरुतम, परम धाम, सत्य और सत्य पराक्रम वाले हैं। वे निमिष और अनिमिष (पलक मूँदे और खुले), माला धारण करने वाले, वाणी के स्वामी और उदार बुद्धि वाले हैं।

  25. अग्रणीर्ग्रामणीः श्रीमान् न्यायो नेता समीरणः। सहस्रमूर्धा विश्वात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात्॥

    Agraṇīrgrāmaṇīḥ shrīmān nyāyo netā samīraṇaḥ | Sahasramūrdhā vishvātmā sahasrākṣhaḥ sahasrapāt ||

    वे आगे ले जाने वाले अग्रणी, समूहों के नायक ग्रामणी, श्रीमान, न्याय, नेता और प्राणवायु रूप समीरण हैं। वे हज़ार सिरों वाले, विश्वात्मा, हज़ार नेत्रों और हज़ार चरणों वाले हैं।

  26. आवर्तनो निवृत्तात्मा संवृतः सम्प्रमर्दनः। अहः संवर्तको वह्निरनिलो धरणीधरः॥

    Āvartano nivṛttātmā saṃvṛtaḥ sampramardanaḥ | Ahaḥ saṃvartako vahniranilo dharaṇīdharaḥ ||

    वे संसार-चक्र को घुमाने वाले, फिर भी उससे निवृत्त आत्मा, माया से ढके हुए और दुष्टों का मर्दन करने वाले हैं। वे दिन को समेटने वाले, अग्नि, वायु और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।

  27. सुप्रसादः प्रसन्नात्मा विश्वधृग्विश्वभुग्विभुः। सत्कर्ता सत्कृतः साधुर्जह्नुर्नारायणो नरः॥

    Suprasādaḥ prasannātmā vishvadhṛgvishvabhugvibhuḥ | Satkartā satkṛtaḥ sādhurjahnurnārāyaṇo naraḥ ||

    वे अत्यन्त प्रसन्न होने वाले, प्रसन्नात्मा, विश्व को धारण करने और भोगने वाले तथा सर्वव्यापक हैं। वे सत्कर्ता, सम्मानित, साधु, प्रलय में सबको लीन करने वाले जह्नु तथा नारायण और नर हैं।

  28. असङ्ख्येयोऽप्रमेयात्मा विशिष्टः शिष्टकृच्छुचिः। सिद्धार्थः सिद्धसङ्कल्पः सिद्धिदः सिद्धिसाधनः॥

    Asaṅkhyeyo'prameyātmā vishiṣhṭaḥ shiṣhṭakṛchchhuchiḥ | Siddhārthaḥ siddhasaṅkalpaḥ siddhidaḥ siddhisādhanaḥ ||

    वे असंख्य नाम-रूपों वाले, अप्रमेयात्मा, विशिष्ट, शिष्टों को बनाने वाले और पवित्र हैं। वे सिद्धार्थ, सत्य संकल्प वाले, सिद्धि देने वाले और सिद्धि के साधन हैं।

  29. वृषाही वृषभो विष्णुर्वृषपर्वा वृषोदरः। वर्धनो वर्धमानश्च विविक्तः श्रुतिसागरः॥

    Vṛṣhāhī vṛṣhabho viṣhṇurvṛṣhaparvā vṛṣhodaraḥ | Vardhano vardhamānashcha viviktaḥ shrutisāgaraḥ ||

    वे धर्म-यज्ञों के स्वामी, कृपा बरसाने वाले वृषभ, विष्णु, धर्म की सीढ़ी और धर्म को उदर में रखने वाले हैं। वे बढ़ाने वाले, स्वयं बढ़ने वाले, सबसे अलग और वेदों के सागर हैं।

  30. सुभुजो दुर्धरो वाग्मी महेन्द्रो वसुदो वसुः। नैकरूपो बृहद्रूपः शिपिविष्टः प्रकाशनः॥

    Subhujo durdharo vāgmī mahendro vasudo vasuḥ | Naikarūpo bṛhadrūpaḥ shipiviṣhṭaḥ prakāshanaḥ ||

    वे सुन्दर भुजाओं वाले, दुर्धर, वाक्पटु, महेन्द्र, धन देने वाले और स्वयं धन हैं। वे अनेक रूपों और विशाल रूपों वाले, किरणों में व्याप्त शिपिविष्ट और सबको प्रकाशित करने वाले हैं।

  31. ओजस्तेजोद्युतिधरः प्रकाशात्मा प्रतापनः। ऋद्धः स्पष्टाक्षरो मन्त्रश्चन्द्रांशुर्भास्करद्युतिः॥

    Ojastejodyutidharaḥ prakāshātmā pratāpanaḥ | Ṛddhaḥ spaṣhṭākṣharo mantrashchandrāṃshurbhāskaradyutiḥ ||

    वे ओज, तेज और द्युति को धारण करने वाले, प्रकाशस्वरूप और ताप देने वाले हैं। वे समृद्ध, स्पष्ट अक्षरों वाले, मन्त्ररूप, चन्द्रमा की किरणों जैसे शीतल और सूर्य जैसी कान्ति वाले हैं।

  32. अमृतांशूद्भवो भानुः शशबिन्दुः सुरेश्वरः। औषधं जगतः सेतुः सत्यधर्मपराक्रमः॥

    Amṛtāṃshūdbhavo bhānuḥ shashabinduḥ sureshvaraḥ | Auṣhadhaṃ jagataḥ setuḥ satyadharmaparākramaḥ ||

    वे चन्द्रमा के उद्गम, सूर्य (भानु), शशबिन्दु (चन्द्र) और देवताओं के ईश्वर हैं। वे संसार की औषधि, भवसागर के सेतु और सत्य धर्म तथा सत्य पराक्रम वाले हैं।

  33. भूतभव्यभवन्नाथः पवनः पावनोऽनलः। कामहा कामकृत्कान्तः कामः कामप्रदः प्रभुः॥

    Bhūtabhavyabhavannāthaḥ pavanaḥ pāvano'nalaḥ | Kāmahā kāmakṛtkāntaḥ kāmaḥ kāmapradaḥ prabhuḥ ||

    वे भूत, भविष्य और वर्तमान के नाथ, पवन, पावन और अग्नि हैं। वे कामनाओं का नाश करने वाले, कामनाएँ पूरी करने वाले, कान्त (सुन्दर), काम्य, इच्छित फल देने वाले और प्रभु हैं।

  34. युगादिकृद्युगावर्तो नैकमायो महाशनः। अदृश्यो व्यक्तरूपश्च सहस्रजिदनन्तजित्॥

    Yugādikṛdyugāvarto naikamāyo mahāshanaḥ | Adṛshyo vyaktarūpashcha sahasrajidanantajit ||

    वे युगों के आरम्भकर्ता और युगचक्र को घुमाने वाले, अनेक मायाओं वाले और प्रलय में सबको ग्रसने वाले हैं। वे अदृश्य होकर भी व्यक्त रूप वाले हैं और सहस्रों तथा अनन्त शत्रुओं को जीतने वाले हैं।

  35. इष्टोऽविशिष्टः शिष्टेष्टः शिखण्डी नहुषो वृषः। क्रोधहा क्रोधकृत्कर्ता विश्वबाहुर्महीधरः॥

    Iṣhṭo'vishiṣhṭaḥ shiṣhṭeṣhṭaḥ shikhaṇḍī nahuṣho vṛṣhaḥ | Krodhahā krodhakṛtkartā vishvabāhurmahīdharaḥ ||

    वे सबके प्रिय, सबके अन्तर्यामी, सज्जनों के इष्ट, मोरपंख धारी शिखण्डी, नहुष और धर्मरूप वृष हैं। वे क्रोध का नाश करने वाले, दुष्टों पर क्रोध करने वाले, कर्ता, विश्वबाहु और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।

  36. अच्युतः प्रथितः प्राणः प्राणदो वासवानुजः। अपांनिधिरधिष्ठानमप्रमत्तः प्रतिष्ठितः॥

    Achyutaḥ prathitaḥ prāṇaḥ prāṇado vāsavānujaḥ | Apāṃnidhiradhiṣhṭhānamapramattaḥ pratiṣhṭhitaḥ ||

    वे अच्युत, प्रसिद्ध, प्राण, प्राणदाता और इन्द्र के अनुज (वामन) हैं। वे जल के निधि (समुद्र), सबके अधिष्ठान, सदा सावधान और अपनी महिमा में प्रतिष्ठित हैं।

  37. स्कन्दः स्कन्दधरो धुर्यो वरदो वायुवाहनः। वासुदेवो बृहद्भानुरादिदेवः पुरन्दरः॥

    Skandaḥ skandadharo dhuryo varado vāyuvāhanaḥ | Vāsudevo bṛhadbhānurādidevaḥ purandaraḥ ||

    वे स्कन्द, धर्ममार्ग को धारण करने वाले, भार उठाने वाले धुर्य, वरदाता और वायु को चलाने वाले हैं। वे वासुदेव, महान तेज वाले, आदिदेव और पुरन्दर हैं।

  38. अशोकस्तारणस्तारः शूरः शौरिर्जनेश्वरः। अनुकूलः शतावर्तः पद्मी पद्मनिभेक्षणः॥

    Ashokastāraṇastāraḥ shūraḥ shaurirjaneshvaraḥ | Anukūlaḥ shatāvartaḥ padmī padmanibhekṣhaṇaḥ ||

    वे शोकरहित, पार उतारने वाले, तारने वाले, शूरवीर, शौरि और जनों के ईश्वर हैं। वे अनुकूल, बार-बार अवतार लेने वाले शतावर्त, कमल धारी और कमल जैसे नेत्रों वाले हैं।

  39. पद्मनाभोऽरविन्दाक्षः पद्मगर्भः शरीरभृत्। महर्द्धिरृद्धो वृद्धात्मा महाक्षो गरुडध्वजः॥

    Padmanābho'ravindākṣhaḥ padmagarbhaḥ sharīrabhṛt | Maharddhirṛddho vṛddhātmā mahākṣho garuḍadhvajaḥ ||

    वे पद्मनाभ, अरविन्दाक्ष, हृदय-कमल में स्थित और शरीर धारण करने वाले हैं। वे महान ऐश्वर्य वाले, समृद्ध, पुरातन आत्मा, विशाल नेत्रों वाले और गरुड़ध्वज हैं।

  40. सर्वलक्षणलक्षण्यो लक्ष्मीवान् समितिञ्जयः॥

    Sarvalakṣhaṇalakṣhaṇyo lakṣhmīvān samitiñjayaḥ ||

    वे अतुलनीय, शरीरों में प्रकाशित शरभ, भयानक भीम, समय के ज्ञाता और हवि ग्रहण करने वाले हरि हैं। वे सब शुभ लक्षणों से युक्त, लक्ष्मीवान और युद्ध में विजयी हैं।

  41. विक्षरो रोहितो मार्गो हेतुर्दामोदरः सहः। महीधरो महाभागो वेगवानमिताशनः॥

    Vikṣharo rohito mārgo heturdāmodaraḥ sahaḥ | Mahīdharo mahābhāgo vegavānamitāshanaḥ ||

    वे क्षयरहित, लाल वर्ण वाले रोहित, मार्ग, हेतु, कमर में रस्सी से बँधे दामोदर और सहनशील हैं। वे पृथ्वी को धारण करने वाले, महाभाग, वेगवान और असीम भोजन करने वाले हैं।

  42. उद्भवः क्षोभणो देवः श्रीगर्भः परमेश्वरः। करणं कारणं कर्ता विकर्ता गहनो गुहः॥

    Udbhavaḥ kṣhobhaṇo devaḥ shrīgarbhaḥ parameshvaraḥ | Karaṇaṃ kāraṇaṃ kartā vikartā gahano guhaḥ ||

    वे सृष्टि के उद्भव, उसे क्षुब्ध करने वाले, देव, श्रीगर्भ और परमेश्वर हैं। वे करण, कारण, कर्ता, विविध रचना करने वाले, गहन और गुप्त (गुह) हैं।

  43. व्यवसायो व्यवस्थानः संस्थानः स्थानदो ध्रुवः। परर्द्धिः परमस्पष्टस्तुष्टः पुष्टः शुभेक्षणः॥

    Vyavasāyo vyavasthānaḥ saṃsthānaḥ sthānado dhruvaḥ | Pararddhiḥ paramaspaṣhṭastuṣhṭaḥ puṣhṭaḥ shubhekṣhaṇaḥ ||

    वे निश्चय रूप, व्यवस्था के आधार, प्रलय में सबके ठहरने का स्थान, स्थान देने वाले और ध्रुव हैं। वे परम ऐश्वर्य वाले, परम स्पष्ट, सन्तुष्ट, पूर्ण और शुभ दृष्टि वाले हैं।

  44. रामो विरामो विरजो मार्गो नेयो नयोऽनयः। वीरः शक्तिमतां श्रेष्ठो धर्मो धर्मविदुत्तमः॥

    Rāmo virāmo virajo mārgo neyo nayo'nayaḥ | Vīraḥ shaktimatāṃ shreṣhṭho dharmo dharmaviduttamaḥ ||

    वे योगियों के रमण-स्थान राम, विराम, निर्मल, मार्ग, प्राप्त करने योग्य, नय (मार्गदर्शक) और अनय हैं। वे वीर, शक्तिमानों में श्रेष्ठ, धर्मस्वरूप और धर्मवेत्ताओं में उत्तम हैं।

  45. वैकुण्ठः पुरुषः प्राणः प्राणदः प्रणवः पृथुः। हिरण्यगर्भः शत्रुघ्नो व्याप्तो वायुरधोक्षजः॥

    Vaikuṇṭhaḥ puruṣhaḥ prāṇaḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ pṛthuḥ | Hiraṇyagarbhaḥ shatrughno vyāpto vāyuradhokṣhajaḥ ||

    वे वैकुण्ठ, पुरुष, प्राण, प्राणदाता, प्रणव (ॐ) और विशाल पृथु हैं। वे हिरण्यगर्भ, शत्रुघ्न, सर्वव्यापक, वायु और इन्द्रियज्ञान से परे अधोक्षज हैं।

  46. ऋतुः सुदर्शनः कालः परमेष्ठी परिग्रहः। उग्रः संवत्सरो दक्षो विश्रामो विश्वदक्षिणः॥

    Ṛtuḥ sudarshanaḥ kālaḥ parameṣhṭhī parigrahaḥ | Ugraḥ saṃvatsaro dakṣho vishrāmo vishvadakṣhiṇaḥ ||

    वे ऋतु, सुदर्शन, काल, परमेष्ठी और सबके आश्रय परिग्रह हैं। वे उग्र, संवत्सर, दक्ष, विश्राम-स्थान और विश्व की दक्षिणा पाने वाले हैं।

  47. विस्तारः स्थावरस्थाणुः प्रमाणं बीजमव्ययम्। अर्थोऽनर्थो महाकोशो महाभोगो महाधनः॥

    Vistāraḥ sthāvarasthāṇuḥ pramāṇaṃ bījamavyayam | Artho'nartho mahākosho mahābhogo mahādhanaḥ ||

    वे जगत का विस्तार, स्थावरों में स्थित स्थाणु, प्रमाण और अविनाशी बीज हैं। वे सबके चाहे जाने वाले अर्थ, स्वयं किसी चीज़ की चाह से रहित अनर्थ, महान कोश, महान भोग और महान धन वाले हैं।

  48. अनिर्विण्णः स्थविष्ठोऽभूर्धर्मयूपो महामखः। नक्षत्रनेमिर्नक्षत्री क्षमः क्षामः समीहनः॥

    Anirviṇṇaḥ sthaviṣhṭho'bhūrdharmayūpo mahāmakhaḥ | Nakṣhatranemirnakṣhatrī kṣhamaḥ kṣhāmaḥ samīhanaḥ ||

    वे कभी न थकने वाले, स्थविष्ठ, अजन्मा, धर्म के यूप और महायज्ञ हैं। वे नक्षत्रों की धुरी, नक्षत्री (चन्द्र), क्षमाशील, प्रलय में शेष रहने वाले और सृष्टि की चेष्टा करने वाले हैं।

  49. यज्ञ इज्यो महेज्यश्च क्रतुः सत्रं सतां गतिः। सर्वदर्शी विमुक्तात्मा सर्वज्ञो ज्ञानमुत्तमम्॥

    Yajña ijyo mahejyashcha kratuḥ satraṃ satāṃ gatiḥ | Sarvadarshī vimuktātmā sarvajño jñānamuttamam ||

    वे यज्ञ, पूज्य, महान पूज्य, क्रतु, सत्र और सज्जनों की गति हैं। वे सर्वदर्शी, नित्य मुक्त आत्मा, सर्वज्ञ और उत्तम ज्ञानस्वरूप हैं।

  50. सुव्रतः सुमुखः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुहृत्। मनोहरो जितक्रोधो वीरबाहुर्विदारणः॥

    Suvrataḥ sumukhaḥ sūkṣhmaḥ sughoṣhaḥ sukhadaḥ suhṛt | Manoharo jitakrodho vīrabāhurvidāraṇaḥ ||

    वे उत्तम व्रत वाले, सुन्दर मुख वाले, सूक्ष्म, मंगल ध्वनि वाले, सुखदाता और सबके सुहृद् हैं। वे मनोहर, क्रोध को जीतने वाले, वीर भुजाओं वाले और दुष्टों को विदीर्ण करने वाले हैं।

  51. स्वापनः स्ववशो व्यापी नैकात्मा नैककर्मकृत्। वत्सरो वत्सलो वत्सी रत्नगर्भो धनेश्वरः॥

    Svāpanaḥ svavasho vyāpī naikātmā naikakarmakṛt | Vatsaro vatsalo vatsī ratnagarbho dhaneshvaraḥ ||

    वे जीवों को माया-निद्रा में सुलाने वाले, स्ववश, व्यापक, अनेक रूपों वाले और अनेक कर्म करने वाले हैं। वे सर्वत्र बसने वाले वत्सर, भक्तवत्सल, वत्सी, रत्नगर्भ और धनेश्वर हैं।

  52. धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी सदसत्क्षरमक्षरम्। अविज्ञाता सहस्रांशुर्विधाता कृतलक्षणः॥

    Dharmagubdharmakṛddharmī sadasatkṣharamakṣharam | Avijñātā sahasrāṃshurvidhātā kṛtalakṣhaṇaḥ ||

    वे धर्म के रक्षक, धर्म के कर्ता और धर्मी हैं; वे सत्-असत् और क्षर-अक्षर दोनों हैं। वे अविज्ञाता (सीमित ज्ञातापन से रहित), सहस्रांशु, विधाता और शुभ लक्षणों वाले हैं।

  53. गभस्तिनेमिः सत्त्वस्थः सिंहो भूतमहेश्वरः। आदिदेवो महादेवो देवेशो देवभृद्गुरुः॥

    Gabhastinemiḥ sattvasthaḥ siṃho bhūtamaheshvaraḥ | Ādidevo mahādevo devesho devabhṛdguruḥ ||

    वे किरणों के केन्द्र, सत्त्व में स्थित, सिंह और भूतों के महेश्वर हैं। वे आदिदेव, महादेव, देवेश और देवताओं के पालक इन्द्र के भी गुरु हैं।

  54. उत्तरो गोपतिर्गोप्ता ज्ञानगम्यः पुरातनः। शरीरभूतभृद्भोक्ता कपीन्द्रो भूरिदक्षिणः॥

    Uttaro gopatirgoptā jñānagamyaḥ purātanaḥ | Sharīrabhūtabhṛdbhoktā kapīndro bhūridakṣhiṇaḥ ||

    वे संसार से पार उतारने वाले उत्तर, गौओं के स्वामी और रक्षक, ज्ञान से जानने योग्य और पुरातन हैं। वे शरीर बनाने वाले भूतों के पालक, भोक्ता, वानरों के स्वामी कपीन्द्र और प्रचुर दक्षिणा देने वाले हैं।

  55. सोमपोऽमृतपः सोमः पुरुजित्पुरुसत्तमः। विनयो जयः सत्यसन्धो दाशार्हः सात्वताम्पतिः॥

    Somapo'mṛtapaḥ somaḥ purujitpurusattamaḥ | Vinayo jayaḥ satyasandho dāshārhaḥ sātvatāmpatiḥ ||

    वे सोम और अमृत पीने वाले, सोमरूप, अनेकों को जीतने वाले और अनेकों में श्रेष्ठ हैं। वे विनय, जय, सत्यप्रतिज्ञ, दाशार्ह और सात्वतों के स्वामी हैं।

  56. जीवो विनयिता साक्षी मुकुन्दोऽमितविक्रमः। अम्भोनिधिरनन्तात्मा महोदधिशयोऽन्तकः॥

    Jīvo vinayitā sākṣhī mukundo'mitavikramaḥ | Ambhonidhiranantātmā mahodadhishayo'ntakaḥ ||

    वे जीव, विनयिता-साक्षी, मोक्ष देने वाले मुकुन्द और अमित पराक्रम वाले हैं। वे समुद्ररूप, अनन्त आत्मा, महासागर में शयन करने वाले और अन्तक (सबका अन्त करने वाले) हैं।

  57. अजो महार्हः स्वाभाव्यो जितामित्रः प्रमोदनः। आनन्दो नन्दनो नन्दः सत्यधर्मा त्रिविक्रमः॥

    Ajo mahārhaḥ svābhāvyo jitāmitraḥ pramodanaḥ | Ānando nandano nandaḥ satyadharmā trivikramaḥ ||

    वे अजन्मा, परम पूजनीय, स्वभावसिद्ध, शत्रुओं को जीतने वाले और आनन्द देने वाले हैं। वे आनन्द, नन्दन, नन्द, सत्यधर्मा और तीन पगों में त्रिलोकी नापने वाले त्रिविक्रम हैं।

  58. महर्षिः कपिलाचार्यः कृतज्ञो मेदिनीपतिः। त्रिपदस्त्रिदशाध्यक्षो महाशृङ्गः कृतान्तकृत्॥

    Maharṣhiḥ kapilāchāryaḥ kṛtajño medinīpatiḥ | Tripadastridashādhyakṣho mahāshṛṅgaḥ kṛtāntakṛt ||

    वे महर्षि कपिलाचार्य, कृतज्ञ, पृथ्वीपति, त्रिपद और देवताओं के अध्यक्ष हैं। मत्स्य रूप में वे महान सींग वाले महाशृंग हैं और काल का भी अन्त करने वाले कृतान्तकृत हैं।

  59. महावराहो गोविन्दः सुषेणः कनकाङ्गदी। गुह्यो गभीरो गहनो गुप्तश्चक्रगदाधरः॥

    Mahāvarāho govindaḥ suṣheṇaḥ kanakāṅgadī | Guhyo gabhīro gahano guptashchakragadādharaḥ ||

    वे महावराह, गोविन्द, सुन्दर सेना वाले सुषेण और स्वर्ण के बाजूबन्द पहनने वाले हैं। वे गुह्य, गम्भीर, गहन, गुप्त और चक्र-गदा धारण करने वाले हैं।

  60. वेधाः स्वाङ्गोऽजितः कृष्णो दृढः सङ्कर्षणोऽच्युतः। वरुणो वारुणो वृक्षः पुष्कराक्षो महामनाः॥

    Vedhāḥ svāṅgo'jitaḥ kṛṣhṇo dṛḍhaḥ saṅkarṣhaṇo'chyutaḥ | Varuṇo vāruṇo vṛkṣhaḥ puṣhkarākṣho mahāmanāḥ ||

    वे वेधा (सृष्टिकर्ता), स्वांग, अजित, कृष्ण, दृढ़, संकर्षण और अच्युत हैं। वे वरुण, वारुण, वृक्ष, पुष्कराक्ष और महान मन वाले हैं।

  61. भगवान् भगहाऽऽनन्दी वनमाली हलायुधः। आदित्यो ज्योतिरादित्यः सहिष्णुर्गतिसत्तमः॥

    Bhagavān bhagahā''nandī vanamālī halāyudhaḥ | Ādityo jyotirādityaḥ sahiṣhṇurgatisattamaḥ ||

    वे छह ऐश्वर्यों से युक्त भगवान, प्रलय में उन्हें समेटने वाले और आनन्दी हैं। वे वनमाला धारी, हलायुध, आदित्य, ज्योतिरादित्य, सहिष्णु और सर्वोत्तम गति हैं।

  62. सुधन्वा खण्डपरशुर्दारुणो द्रविणप्रदः। दिवःस्पृक् सर्वदृग्व्यासो वाचस्पतिरयोनिजः॥

    Sudhanvā khaṇḍaparashurdāruṇo draviṇapradaḥ | Divaḥspṛk sarvadṛgvyāso vāchaspatirayonijaḥ ||

    वे सुन्दर धनुष वाले, परशु धारण करने वाले, दुष्टों के लिए दारुण और धन देने वाले हैं। वे आकाश को छूने वाले, सर्वद्रष्टा, व्यास, वाचस्पति और अयोनिज हैं।

  63. त्रिसामा सामगः साम निर्वाणं भेषजं भिषक्। संन्यासकृच्छमः शान्तो निष्ठा शान्तिः परायणम्॥

    Trisāmā sāmagaḥ sāma nirvāṇaṃ bheṣhajaṃ bhiṣhak | Saṃnyāsakṛchchhamaḥ shānto niṣhṭhā shāntiḥ parāyaṇam ||

    वे तीन सामों से स्तुत, सामगान करने वाले और स्वयं साम हैं; वे निर्वाण, भवरोग की औषधि और वैद्य हैं। वे संन्यास के विधाता, शम, शान्त, निष्ठा, शान्ति और परम आश्रय हैं।

  64. शुभाङ्गः शान्तिदः स्रष्टा कुमुदः कुवलेशयः। गोहितो गोपतिर्गोप्ता वृषभाक्षो वृषप्रियः॥

    Shubhāṅgaḥ shāntidaḥ sraṣhṭā kumudaḥ kuvaleshayaḥ | Gohito gopatirgoptā vṛṣhabhākṣho vṛṣhapriyaḥ ||

    वे सुन्दर अंगों वाले, शान्ति देने वाले, स्रष्टा, पृथ्वी को आनन्दित करने वाले कुमुद और जल में शयन करने वाले हैं। वे गौओं के हितैषी, गोपति, गोप्ता, धर्ममय नेत्रों वाले और धर्मप्रिय हैं।

  65. अनिवर्ती निवृत्तात्मा सङ्क्षेप्ता क्षेमकृच्छिवः। श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासः श्रीपतिः श्रीमतांवरः॥

    Anivartī nivṛttātmā saṅkṣheptā kṣhemakṛchchhivaḥ | Shrīvatsavakṣhāḥ shrīvāsaḥ shrīpatiḥ shrīmatāṃvaraḥ ||

    वे धर्म से कभी न हटने वाले, विषयों से निवृत्त, प्रलय में सृष्टि को समेटने वाले, क्षेम करने वाले और शिव (मंगलमय) हैं। वे वक्ष पर श्रीवत्स धारण करने वाले, लक्ष्मी के निवास, श्रीपति और श्रीमानों में श्रेष्ठ हैं।

  66. श्रीदः श्रीशः श्रीनिवासः श्रीनिधिः श्रीविभावनः। श्रीधरः श्रीकरः श्रेयः श्रीमाँल्लोकत्रयाश्रयः॥

    Shrīdaḥ shrīshaḥ shrīnivāsaḥ shrīnidhiḥ shrīvibhāvanaḥ | Shrīdharaḥ shrīkaraḥ shreyaḥ shrīmāṃllokatrayāshrayaḥ ||

    वे श्री देने वाले, श्री के ईश, श्रीनिवास, श्रीनिधि और श्री को बाँटने वाले हैं। वे श्रीधर, श्रीकर, परम कल्याण, श्रीमान और तीनों लोकों के आश्रय हैं।

  67. स्वक्षः स्वङ्गः शतानन्दो नन्दिर्ज्योतिर्गणेश्वरः। विजितात्माऽविधेयात्मा सत्कीर्तिश्छिन्नसंशयः॥

    Svakṣhaḥ svaṅgaḥ shatānando nandirjyotirgaṇeshvaraḥ | Vijitātmā'vidheyātmā satkīrtishchhinnasaṃshayaḥ ||

    वे सुन्दर नेत्रों और सुन्दर अंगों वाले, शतानन्द, नन्दि और ज्योतिगणों के ईश्वर हैं। वे विजितात्मा, किसी के अधीन न रहने वाले, सत्कीर्ति और सब संशयों को काटने वाले हैं।

  68. उदीर्णः सर्वतश्चक्षुरनीशः शाश्वतस्थिरः। भूशयो भूषणो भूतिर्विशोकः शोकनाशनः॥

    Udīrṇaḥ sarvatashchakṣhuranīshaḥ shāshvatasthiraḥ | Bhūshayo bhūṣhaṇo bhūtirvishokaḥ shokanāshanaḥ ||

    वे सबसे ऊपर उठे हुए, सब ओर नेत्रों वाले, जिनका कोई स्वामी नहीं ऐसे अनीश और शाश्वत-स्थिर हैं। वे भूमि पर शयन करने वाले, संसार के भूषण, विभूति, शोकरहित और शोक का नाश करने वाले हैं।

  69. अर्चिष्मानर्चितः कुम्भो विशुद्धात्मा विशोधनः। अनिरुद्धोऽप्रतिरथः प्रद्युम्नोऽमितविक्रमः॥

    Archiṣhmānarchitaḥ kumbho vishuddhātmā vishodhanaḥ | Aniruddho'pratirathaḥ pradyumno'mitavikramaḥ ||

    वे तेजस्वी, सबके द्वारा पूजित, सबको अपने भीतर रखने वाले कुम्भ, विशुद्धात्मा और शुद्ध करने वाले हैं। वे अनिरुद्ध, अप्रतिरथ (जिनका कोई प्रतिद्वन्द्वी नहीं), प्रद्युम्न और अमित पराक्रमी हैं।

  70. कालनेमिनिहा वीरः शौरिः शूरजनेश्वरः। त्रिलोकात्मा त्रिलोकेशः केशवः केशिहा हरिः॥

    Kālaneminihā vīraḥ shauriḥ shūrajaneshvaraḥ | Trilokātmā trilokeshaḥ keshavaḥ keshihā hariḥ ||

    वे कालनेमि का वध करने वाले, वीर, शौरि और शूरवीरों के ईश्वर हैं। वे त्रिलोकी की आत्मा, त्रिलोकेश, केशव, केशी दैत्य का वध करने वाले और पापहारी हरि हैं।

  71. कामदेवः कामपालः कामी कान्तः कृतागमः। अनिर्देश्यवपुर्विष्णुर्वीरोऽनन्तो धनञ्जयः॥

    Kāmadevaḥ kāmapālaḥ kāmī kāntaḥ kṛtāgamaḥ | Anirdeshyavapurviṣhṇurvīro'nanto dhanañjayaḥ ||

    वे कामदेव, कामनाओं के रक्षक कामपाल, पूर्णकाम, कान्त और शास्त्रों के रचयिता कृतागम हैं। वे अनिर्देश्य रूप वाले, विष्णु, वीर, अनन्त और धनञ्जय हैं।

  72. ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद् ब्रह्मा ब्रह्म ब्रह्मविवर्धनः। ब्रह्मविद् ब्राह्मणो ब्रह्मी ब्रह्मज्ञो ब्राह्मणप्रियः॥

    Brahmaṇyo brahmakṛd brahmā brahma brahmavivardhanaḥ | Brahmavid brāhmaṇo brahmī brahmajño brāhmaṇapriyaḥ ||

    वे ब्रह्मण्य, ब्रह्म के कर्ता, ब्रह्मा, स्वयं ब्रह्म और वेद-तप को बढ़ाने वाले हैं। वे ब्रह्मवेत्ता, ब्राह्मण, ब्रह्मी, वेदों के ज्ञाता और ब्राह्मणों के प्रिय हैं।

  73. महाक्रमो महाकर्मा महातेजा महोरगः। महाक्रतुर्महायज्वा महायज्ञो महाहविः॥

    Mahākramo mahākarmā mahātejā mahoragaḥ | Mahākraturmahāyajvā mahāyajño mahāhaviḥ ||

    वे महान डग भरने वाले, महान कर्म करने वाले, महान तेज वाले और महान नाग हैं। वे महाक्रतु, महायज्वा, महायज्ञ और महान हवि हैं।

  74. स्तव्यः स्तवप्रियः स्तोत्रं स्तुतिः स्तोता रणप्रियः। पूर्णः पूरयिता पुण्यः पुण्यकीर्तिरनामयः॥

    Stavyaḥ stavapriyaḥ stotraṃ stutiḥ stotā raṇapriyaḥ | Pūrṇaḥ pūrayitā puṇyaḥ puṇyakīrtiranāmayaḥ ||

    वे स्तुति के योग्य, स्तुतिप्रिय, स्तोत्र, स्तुति और स्तुति करने वाले स्वयं हैं; वे युद्धप्रिय हैं। वे पूर्ण, पूर्ण करने वाले, पुण्य, पुण्यकीर्ति और रोगरहित (अनामय) हैं।

  75. मनोजवस्तीर्थकरो वसुरेता वसुप्रदः। वसुप्रदो वासुदेवो वसुर्वसुमना हविः॥

    Manojavastīrthakaro vasuretā vasupradaḥ | Vasuprado vāsudevo vasurvasumanā haviḥ ||

    वे मन के समान वेगवान, तीर्थों (विद्याओं) के कर्ता, हिरण्यरेता और धन देने वाले हैं। वे मोक्षरूपी धन देने वाले, वासुदेव, वसु, वसुमना और हवि हैं।

  76. सद्गतिः सत्कृतिः सत्ता सद्भूतिः सत्परायणः। शूरसेनो यदुश्रेष्ठः सन्निवासः सुयामुनः॥

    Sadgatiḥ satkṛtiḥ sattā sadbhūtiḥ satparāyaṇaḥ | Shūraseno yadushreṣhṭhaḥ sannivāsaḥ suyāmunaḥ ||

    वे सज्जनों की गति, सत्कर्म, सत्ता, सद्भूति और सत्पुरुषों के परम आश्रय हैं। वे शूरसेन, यदुश्रेष्ठ, सज्जनों के निवास और यमुना तट के निवासियों से घिरे सुयामुन हैं।

  77. भूतावासो वासुदेवः सर्वासुनिलयोऽनलः। दर्पहा दर्पदो दृप्तो दुर्धरोऽथापराजितः॥

    Bhūtāvāso vāsudevaḥ sarvāsunilayo'nalaḥ | Darpahā darpado dṛpto durdharo'thāparājitaḥ ||

    वे सब भूतों के निवास, वासुदेव, सब प्राणों के आश्रय और अनल हैं। वे अधर्मियों का दर्प हरने वाले, धर्मात्माओं को गौरव देने वाले, आनन्द से तृप्त, दुर्धर और अपराजित हैं।

  78. विश्वमूर्तिर्महामूर्तिर्दीप्तमूर्तिरमूर्तिमान्। अनेकमूर्तिरव्यक्तः शतमूर्तिः शताननः॥

    Vishvamūrtirmahāmūrtirdīptamūrtiramūrtimān | Anekamūrtiravyaktaḥ shatamūrtiḥ shatānanaḥ ||

    वे विश्वमूर्ति, महामूर्ति, दीप्तमूर्ति और अमूर्तिमान हैं। वे अनेकमूर्ति, अव्यक्त, शतमूर्ति और शतानन (सौ मुखों वाले) हैं।

  79. एको नैकः सवः कः किं यत् तत्पदमनुत्तमम्। लोकबन्धुर्लोकनाथो माधवो भक्तवत्सलः॥

    Eko naikaḥ savaḥ kaḥ kiṃ yat tatpadamanuttamam | Lokabandhurlokanātho mādhavo bhaktavatsalaḥ ||

    वे एक भी हैं और अनेक भी; वे सव (यज्ञ), क (सुख), किम् (जिज्ञासा का विषय), यत्, तत् और अनुत्तम पद हैं। वे लोकबन्धु, लोकनाथ, माधव और भक्तवत्सल हैं।

  80. सुवर्णवर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी। वीरहा विषमः शून्यो घृताशीरचलश्चलः॥

    Suvarṇavarṇo hemāṅgo varāṅgashchandanāṅgadī | Vīrahā viṣhamaḥ shūnyo ghṛtāshīrachalashchalaḥ ||

    वे स्वर्ण वर्ण वाले, स्वर्ण अंगों वाले, सुन्दर अंगों वाले और चन्दन-युक्त बाजूबन्द धारी हैं। वे दुष्ट वीरों का संहार करने वाले, अद्वितीय, निर्गुण होने से शून्य, घृत-आहुति भोगने वाले, अचल और चल हैं।

  81. अमानी मानदो मान्यो लोकस्वामी त्रिलोकधृक्। सुमेधा मेधजो धन्यः सत्यमेधा धराधरः॥

    Amānī mānado mānyo lokasvāmī trilokadhṛk | Sumedhā medhajo dhanyaḥ satyamedhā dharādharaḥ ||

    वे अभिमानरहित, दूसरों को मान देने वाले, सबके माननीय, लोकों के स्वामी और त्रिलोकी को धारण करने वाले हैं। वे सुमेधा, यज्ञ से प्रकट मेधज, धन्य, सत्य मेधा वाले और पृथ्वी को धारण करने वाले हैं।

  82. तेजोवृषो द्युतिधरः सर्वशस्त्रभृतां वरः। प्रग्रहो निग्रहो व्यग्रो नैकशृङ्गो गदाग्रजः॥

    Tejovṛṣho dyutidharaḥ sarvashastrabhṛtāṃ varaḥ | Pragraho nigraho vyagro naikashṛṅgo gadāgrajaḥ ||

    वे तेज की वर्षा करने वाले, द्युति को धारण करने वाले और सब शस्त्रधारियों में श्रेष्ठ हैं। वे जगत की लगाम थामने वाले, निग्रह करने वाले, अविचलित, अनेक शृंगों वाले और गद के बड़े भाई गदाग्रज हैं।

  83. चतुर्मूर्तिश्चतुर्बाहुश्चतुर्व्यूहश्चतुर्गतिः। चतुरात्मा चतुर्भावश्चतुर्वेदविदेकपात्॥

    Chaturmūrtishchaturbāhushchaturvyūhashchaturgatiḥ | Chaturātmā chaturbhāvashchaturvedavidekapāt ||

    वे चतुर्मूर्ति, चतुर्भुज, चतुर्व्यूह और चारों आश्रमों-वर्णों की गति हैं। वे चतुरात्मा, चतुर्भाव, चारों वेदों के ज्ञाता और एकपाद हैं।

  84. समावर्तोऽनिवृत्तात्मा दुर्जयो दुरतिक्रमः। दुर्लभो दुर्गमो दुर्गो दुरावासो दुरारिहा॥

    Samāvarto'nivṛttātmā durjayo duratikramaḥ | Durlabho durgamo durgo durāvāso durārihā ||

    वे संसार-चक्र को घुमाने वाले, कभी न लौटने वाले आत्मा वाले, दुर्जय और दुरतिक्रम हैं। वे दुर्लभ, दुर्गम, दुर्ग, कठिनाई से हृदय में बसाए जाने वाले और दुष्टों का संहार करने वाले हैं।

  85. शुभाङ्गो लोकसारङ्गः सुतन्तुस्तन्तुवर्धनः। इन्द्रकर्मा महाकर्मा कृतकर्मा कृतागमः॥

    Shubhāṅgo lokasāraṅgaḥ sutantustantuvardhanaḥ | Indrakarmā mahākarmā kṛtakarmā kṛtāgamaḥ ||

    वे शुभ अंगों वाले, लोकों के सार को ग्रहण करने वाले, सुन्दर तन्तु और उस तन्तु (सृष्टि) को बढ़ाने वाले हैं। वे इन्द्र के समान कर्म करने वाले, महाकर्मा, कृतकर्मा और शास्त्रों के प्रणेता हैं।

  86. उद्भवः सुन्दरः सुन्दो रत्ननाभः सुलोचनः। अर्को वाजसनः शृङ्गी जयन्तः सर्वविज्जयी॥

    Udbhavaḥ sundaraḥ sundo ratnanābhaḥ sulochanaḥ | Arko vājasanaḥ shṛṅgī jayantaḥ sarvavijjayī ||

    वे सबके उद्भव, सुन्दर, करुणामय सुन्द, रत्ननाभ और सुन्दर नेत्रों वाले हैं। वे अर्क (सूर्य), अन्नदाता वाजसन, शृंगी, जयन्त और सर्वज्ञ विजेता हैं।

  87. सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्यः सर्ववागीश्वरेश्वरः। महाह्रदो महागर्तो महाभूतो महानिधिः॥

    Suvarṇabindurakṣhobhyaḥ sarvavāgīshvareshvaraḥ | Mahāhrado mahāgarto mahābhūto mahānidhiḥ ||

    वे स्वर्णिम अक्षर-बिन्दु, अक्षोभ्य और सब वागीश्वरों के भी ईश्वर हैं। वे महान सरोवर, महान गर्त, महाभूत और महान निधि हैं।

  88. कुमुदः कुन्दरः कुन्दः पर्जन्यः पावनोऽनिलः। अमृताशोऽमृतवपुः सर्वज्ञः सर्वतोमुखः॥

    Kumudaḥ kundaraḥ kundaḥ parjanyaḥ pāvano'nilaḥ | Amṛtāsho'mṛtavapuḥ sarvajñaḥ sarvatomukhaḥ ||

    वे पृथ्वी को आनन्द देने वाले कुमुद, फल देने वाले कुन्दर, कुन्द-पुष्प जैसे निर्मल, पर्जन्य (मेघ), पावन और अनिल हैं। वे अमृत भोगने वाले, अमृत शरीर वाले, सर्वज्ञ और सर्वतोमुख हैं।

  89. सुलभः सुव्रतः सिद्धः शत्रुजिच्छत्रुतापनः। न्यग्रोधोऽदुम्बरोऽश्वत्थश्चाणूरान्ध्रनिषूदनः॥

    Sulabhaḥ suvrataḥ siddhaḥ shatrujichchhatrutāpanaḥ | Nyagrodho'dumbaro'shvatthashchāṇūrāndhraniṣhūdanaḥ ||

    वे भक्ति से सुलभ, सुव्रत, सिद्ध, शत्रुओं को जीतने वाले और शत्रुओं को तपाने वाले हैं। वे न्यग्रोध (बरगद), उदुम्बर (गूलर), अश्वत्थ (पीपल) और चाणूर मल्ल का वध करने वाले हैं।

  90. सहस्रार्चिः सप्तजिह्वः सप्तैधाः सप्तवाहनः। अमूर्तिरनघोऽचिन्त्यो भयकृद्भयनाशनः॥

    Sahasrārchiḥ saptajihvaḥ saptaidhāḥ saptavāhanaḥ | Amūrtiranagho'chintyo bhayakṛdbhayanāshanaḥ ||

    वे सहस्र किरणों वाले, सात जिह्वाओं वाले, सात ज्वालाओं वाले और सात वाहनों वाले (अग्नि-सूर्य रूप) हैं। वे अमूर्ति, निष्पाप, अचिन्त्य, दुष्टों को भय देने वाले और भय का नाश करने वाले हैं।

  91. अणुर्बृहत्कृशः स्थूलो गुणभृन्निर्गुणो महान्। अधृतः स्वधृतः स्वास्यः प्राग्वंशो वंशवर्धनः॥

    Aṇurbṛhatkṛshaḥ sthūlo guṇabhṛnnirguṇo mahān | Adhṛtaḥ svadhṛtaḥ svāsyaḥ prāgvaṃsho vaṃshavardhanaḥ ||

    वे अणु और बृहत्, कृश और स्थूल, गुणों को धारण करने वाले और निर्गुण तथा महान हैं। वे अधृत, स्वधृत, सुन्दर मुख वाले, सबसे प्राचीन वंश वाले और वंश को बढ़ाने वाले हैं।

  92. भारभृत् कथितो योगी योगीशः सर्वकामदः। आश्रमः श्रमणः क्षामः सुपर्णो वायुवाहनः॥

    Bhārabhṛt kathito yogī yogīshaḥ sarvakāmadaḥ | Āshramaḥ shramaṇaḥ kṣhāmaḥ suparṇo vāyuvāhanaḥ ||

    वे जगत का भार उठाने वाले, शास्त्रों में कथित, योगी, योगीश और सब कामनाएँ पूरी करने वाले हैं। वे आश्रम, श्रमण, क्षाम, सुपर्ण और वायुवाहन हैं।

  93. धनुर्धरो धनुर्वेदो दण्डो दमयिता दमः। अपराजितः सर्वसहो नियन्ताऽनियमोऽयमः॥

    Dhanurdharo dhanurvedo daṇḍo damayitā damaḥ | Aparājitaḥ sarvasaho niyantā'niyamo'yamaḥ ||

    वे धनुर्धर, धनुर्वेद, दण्ड, दमन करने वाले और दम (संयम) हैं। वे अपराजित, सर्वसह, नियन्ता, स्वयं नियम से परे और मृत्यु से परे हैं।

  94. सत्त्ववान् सात्त्विकः सत्यः सत्यधर्मपरायणः। अभिप्रायः प्रियार्होऽर्हः प्रियकृत् प्रीतिवर्धनः॥

    Sattvavān sāttvikaḥ satyaḥ satyadharmaparāyaṇaḥ | Abhiprāyaḥ priyārho'rhaḥ priyakṛt prītivardhanaḥ ||

    वे सत्त्ववान, सात्त्विक, सत्य और सत्य-धर्म में तत्पर हैं। वे सबके अभिप्राय, प्रिय वस्तुओं से पूजे जाने योग्य, अर्ह, प्रिय करने वाले और प्रीति को बढ़ाने वाले हैं।

  95. विहायसगतिर्ज्योतिः सुरुचिर्हुतभुग्विभुः। रविर्विरोचनः सूर्यः सविता रविलोचनः॥

    Vihāyasagatirjyotiḥ suruchirhutabhugvibhuḥ | Ravirvirochanaḥ sūryaḥ savitā ravilochanaḥ ||

    वे आकाश में गति करने वाले, ज्योति, सुन्दर कान्ति वाले, हवि भोगने वाले अग्नि और विभु हैं। वे रवि, विरोचन, सूर्य, सविता और सूर्य जिनका नेत्र है ऐसे रविलोचन हैं।

  96. अनन्तो हुतभुग्भोक्ता सुखदो नैकजोऽग्रजः। अनिर्विण्णः सदामर्षी लोकाधिष्ठानमद्भुतः॥

    Ananto hutabhugbhoktā sukhado naikajo'grajaḥ | Anirviṇṇaḥ sadāmarṣhī lokādhiṣhṭhānamadbhutaḥ ||

    वे अनन्त, हुतभुक, भोक्ता, सुखदाता, अनेक बार जन्म लेने वाले और अग्रज हैं। वे कभी खिन्न न होने वाले, सज्जनों को क्षमा करने वाले, लोकों के अधिष्ठान और अद्भुत हैं।

  97. सनात्सनातनतमः कपिलः कपिरव्ययः। स्वस्तिदः स्वस्तिकृत्स्वस्ति स्वस्तिभुक्स्वस्तिदक्षिणः॥

    Sanātsanātanatamaḥ kapilaḥ kapiravyayaḥ | Svastidaḥ svastikṛtsvasti svastibhuksvastidakṣhiṇaḥ ||

    वे सनातन, सनातनों में भी सबसे पुराने, कपिल, कपि (सूर्य) और अव्यय हैं। वे स्वस्ति देने वाले, स्वस्ति करने वाले, स्वयं स्वस्ति, स्वस्ति का भोग करने वाले और स्वस्ति प्रदान करने वाले हैं।

  98. अरौद्रः कुण्डली चक्री विक्रम्यूर्जितशासनः। शब्दातिगः शब्दसहः शिशिरः शर्वरीकरः॥

    Araudraḥ kuṇḍalī chakrī vikramyūrjitashāsanaḥ | Shabdātigaḥ shabdasahaḥ shishiraḥ sharvarīkaraḥ ||

    वे अरौद्र (सौम्य), कुण्डलधारी, चक्रधारी, पराक्रमी और प्रबल शासन वाले हैं। वे शब्दों से परे, वेदों द्वारा स्तुत, शिशिर के समान शीतल और रात्रि को रचने वाले हैं।

  99. अक्रूरः पेशलो दक्षो दक्षिणः क्षमिणांवरः। विद्वत्तमो वीतभयः पुण्यश्रवणकीर्तनः॥

    Akrūraḥ peshalo dakṣho dakṣhiṇaḥ kṣhamiṇāṃvaraḥ | Vidvattamo vītabhayaḥ puṇyashravaṇakīrtanaḥ ||

    वे अक्रूर, पेशल (कोमल), दक्ष, दक्षिण (उदार) और क्षमाशीलों में श्रेष्ठ हैं। वे विद्वानों में उत्तम, निर्भय और ऐसे हैं जिनका श्रवण-कीर्तन पुण्यदायक है।

  100. उत्तारणो दुष्कृतिहा पुण्यो दुःस्वप्ननाशनः। वीरहा रक्षणः सन्तो जीवनः पर्यवस्थितः॥

    Uttāraṇo duṣhkṛtihā puṇyo duḥsvapnanāshanaḥ | Vīrahā rakṣhaṇaḥ santo jīvanaḥ paryavasthitaḥ ||

    वे भवसागर से पार उतारने वाले, दुष्कर्मों का नाश करने वाले, पुण्य और दुःस्वप्न का नाश करने वाले हैं। वे दुष्टों का संहार करने वाले, रक्षक, सन्त, सबके जीवन और सर्वत्र स्थित हैं।

  101. अनन्तरूपोऽनन्तश्रीर्जितमन्युर्भयापहः। चतुरश्रो गभीरात्मा विदिशो व्यादिशो दिशः॥

    Anantarūpo'nantashrīrjitamanyurbhayāpahaḥ | Chaturashro gabhīrātmā vidisho vyādisho dishaḥ ||

    वे अनन्तरूप, अनन्त श्री वाले, क्रोध को जीतने वाले और भय का नाश करने वाले हैं। वे चतुरश्र (न्यायपूर्ण), गम्भीर आत्मा वाले और सब दिशाओं में सबको उनका फल देने वाले हैं।

  102. अनादिर्भूर्भुवो लक्ष्मीः सुवीरो रुचिराङ्गदः। जननो जनजन्मादिर्भीमो भीमपराक्रमः॥

    Anādirbhūrbhuvo lakṣhmīḥ suvīro ruchirāṅgadaḥ | Janano janajanmādirbhīmo bhīmaparākramaḥ ||

    वे अनादि, पृथ्वी के आधार, लक्ष्मीस्वरूप, सुवीर और सुन्दर बाजूबन्द वाले हैं। वे जनन, सब जन्मों के मूल कारण, भीम और भयंकर पराक्रम वाले हैं।

  103. आधारनिलयोऽधाता पुष्पहासः प्रजागरः। ऊर्ध्वगः सत्पथाचारः प्राणदः प्रणवः पणः॥

    Ādhāranilayo'dhātā puṣhpahāsaḥ prajāgaraḥ | Ūrdhvagaḥ satpathāchāraḥ prāṇadaḥ praṇavaḥ paṇaḥ ||

    वे आधारों के भी आधार, जिनका कोई धाता नहीं ऐसे अधाता, फूलों जैसी मुस्कान वाले और सदा जागरूक हैं। वे ऊर्ध्वगामी, सत्पथ पर चलने वाले, प्राणदाता, प्रणव और पण (व्यवहार के फलदाता) हैं।

  104. प्रमाणं प्राणनिलयः प्राणभृत्प्राणजीवनः। तत्त्वं तत्त्वविदेकात्मा जन्ममृत्युजरातिगः॥

    Pramāṇaṃ prāṇanilayaḥ prāṇabhṛtprāṇajīvanaḥ | Tattvaṃ tattvavidekātmā janmamṛtyujarātigaḥ ||

    वे प्रमाण, प्राणों के निवास, प्राणों का पोषण करने वाले और प्राणियों के जीवन हैं। वे तत्त्व, तत्त्ववेत्ता, एकात्मा और जन्म, मृत्यु और जरा से परे हैं।

  105. भूर्भुवःस्वस्तरुस्तारः सविता प्रपितामहः। यज्ञो यज्ञपतिर्यज्वा यज्ञाङ्गो यज्ञवाहनः॥

    Bhūrbhuvaḥsvastarustāraḥ savitā prapitāmahaḥ | Yajño yajñapatiryajvā yajñāṅgo yajñavāhanaḥ ||

    वे भूः, भुवः, स्वः रूपी तीनों लोकों के वृक्ष, तारने वाले, सविता और प्रपितामह हैं। वे यज्ञ, यज्ञपति, यजमान, यज्ञ के अंग और यज्ञ को पूर्ण कराने वाले हैं।

  106. यज्ञभृद् यज्ञकृद् यज्ञी यज्ञभुग् यज्ञसाधनः। यज्ञान्तकृद् यज्ञगुह्यमन्नमन्नाद एव च॥

    Yajñabhṛd yajñakṛd yajñī yajñabhug yajñasādhanaḥ | Yajñāntakṛd yajñaguhyamannamannāda eva cha ||

    वे यज्ञ के धारक, यज्ञकर्ता, यज्ञी, यज्ञभोक्ता और यज्ञ के साधन हैं। वे यज्ञ को पूर्ण करने वाले, यज्ञ के रहस्य, अन्न और अन्न खाने वाले हैं।

  107. आत्मयोनिः स्वयञ्जातो वैखानः सामगायनः। देवकीनन्दनः स्रष्टा क्षितीशः पापनाशनः॥

    Ātmayoniḥ svayañjāto vaikhānaḥ sāmagāyanaḥ | Devakīnandanaḥ sraṣhṭā kṣhitīshaḥ pāpanāshanaḥ ||

    वे स्वयं अपने कारण आत्मयोनि, स्वयंजात, वैखान और सामगान करने वाले हैं। वे देवकीनन्दन, स्रष्टा, पृथ्वीपति और पापों का नाश करने वाले हैं।

  108. शङ्खभृन्नन्दकी चक्री शार्ङ्गधन्वा गदाधरः। रथाङ्गपाणिरक्षोभ्यः सर्वप्रहरणायुधः॥

    Shaṅkhabhṛnnandakī chakrī shārṅgadhanvā gadādharaḥ | Rathāṅgapāṇirakṣhobhyaḥ sarvapraharaṇāyudhaḥ ||

    वे शंख, नन्दक खड्ग और चक्र धारण करने वाले, शार्ङ्ग धनुषधारी और गदाधर हैं। वे हाथ में रथ का पहिया (चक्र) लिए, अक्षोभ्य और सब प्रकार के आयुध धारण करने वाले हैं।

  109. वनमाली गदी शार्ङ्गी शङ्खी चक्री च नन्दकी। श्रीमान् नारायणो विष्णुर्वासुदेवोऽभिरक्षतु॥

    Vanamālī gadī shārṅgī shaṅkhī chakrī cha nandakī | Shrīmān nārāyaṇo viṣhṇurvāsudevo'bhirakṣhatu ||

    वनमाला, गदा, शार्ङ्ग धनुष, शंख, चक्र और नन्दक खड्ग धारण करने वाले श्रीमान नारायण, विष्णु, वासुदेव हमारी रक्षा करें।

  110. श्रीराम राम रामेति रमे रामे मनोरमे। सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने॥

    Shrīrāma rāma rāmeti rame rāme manorame | Sahasranāma tattulyaṃ rāmanāma varānane ||

    भगवान शिव पार्वती से कहते हैं — हे मनोरमे, मैं 'श्रीराम राम राम' जपते हुए राम में ही रमण करता हूँ। हे वरानने, एक राम-नाम ही विष्णु के सहस्र नामों के तुल्य है।

अर्थ एवं महत्व

महाभारत युद्ध के बाद शरशय्या पर लेटे भीष्म पितामह से युधिष्ठिर ने पूछा — संसार में एक परम देवता कौन है, किसकी स्तुति और पूजा से मनुष्य कल्याण पाता है, और सबसे श्रेष्ठ धर्म क्या है? उत्तर में भीष्म ने, श्रीकृष्ण की उपस्थिति में, विष्णु के सहस्र नामों का यह स्तोत्र सुनाया, जिसे परंपरा महर्षि वेदव्यास द्वारा रचित महाभारत के अनुशासन पर्व का अंश मानती है। ये नाम विष्णु को एक साथ निराकार ब्रह्म, सृष्टि-पालन-संहार के कर्ता और राम, कृष्ण, वामन, नृसिंह जैसे अवतारों के रूप में प्रस्तुत करते हैं — इसलिए यह स्तोत्र भक्ति और वेदान्त दोनों का सार माना जाता है। आदि शंकराचार्य ने इस पर भाष्य लिखा और पराशर भट्ट जैसे आचार्यों ने भी इसकी व्याख्या की। आज यह भारत भर में, विशेषकर दक्षिण भारत में, घरों और मन्दिरों में प्रातःकाल, गुरुवार और एकादशी को सबसे अधिक पढ़े जाने वाले स्तोत्रों में से है।

स्तोत्र के सभी १०८ श्लोक अनुष्टुप् छन्द में हैं — प्रत्येक श्लोक में आठ-आठ अक्षरों के चार चरण।

लाभ

  • परंपरागत रूप से मन की शान्ति, एकाग्रता और भक्ति की वृद्धि के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • भक्त मानते हैं कि इसका नियमित पाठ भय और विघ्नों से रक्षा करता है, जैसा कि स्वयं ध्यान-श्लोक में "सर्वविघ्नोपशान्तये" कहा गया है।
  • महाभारत की फलश्रुति के अनुसार इसका श्रवण और कीर्तन करने वाला कल्याण और यश पाता है — यह परंपरागत आस्था है।
  • गुरुवार, एकादशी, वैकुण्ठ एकादशी और सत्यनारायण पूजा जैसे अवसरों पर इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।

पाठ विधि

स्नान के बाद, सम्भव हो तो प्रातःकाल, भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण के चित्र के सामने दीप जलाकर शान्त मन से बैठें। पहले ध्यान-श्लोक "शुक्लाम्बरधरं विष्णुं" पढ़ें, फिर १०८ श्लोक क्रम से स्पष्ट उच्चारण के साथ पढ़ें और अन्त में "श्रीराम राम रामेति" श्लोक से समापन करें। पूरा पाठ सामान्यतः २५–३० मिनट लेता है; आरम्भ करने वाले किसी जानकार के स्वर के साथ या ऑडियो सुनकर उच्चारण सीख सकते हैं।

सामान्य प्रश्न

विष्णु सहस्रनाम किसने रचा?
यह महाभारत के अनुशासन पर्व का अंश है, जिसके रचयिता परंपरा से महर्षि वेदव्यास माने जाते हैं। कथा में इसे भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को सुनाया था।
विष्णु सहस्रनाम में कितने श्लोक हैं?
मुख्य स्तोत्र में १०८ श्लोक हैं ("विश्वं विष्णुर्वषट्कारो" से "वनमाली गदी शार्ङ्गी" तक), जिनमें विष्णु के एक हज़ार नाम हैं। इसके पहले ध्यान-श्लोक और न्यास तथा बाद में फलश्रुति के श्लोक भी पढ़े जाते हैं।
क्या इसमें सचमुच एक हज़ार अलग-अलग नाम हैं?
परंपरा के अनुसार इसमें एक हज़ार नाम हैं, पर कुछ नाम — जैसे "विष्णु", "माधव", "अच्युत" — एक से अधिक बार आते हैं। भाष्यकार बताते हैं कि हर बार प्रसंग के अनुसार उनका अर्थ अलग होता है।
विष्णु सहस्रनाम का पाठ कब करना चाहिए?
इसे किसी भी दिन पढ़ा जा सकता है, पर परंपरा में प्रातःकाल, गुरुवार, एकादशी और वैकुण्ठ एकादशी पर इसका पाठ विशेष रूप से प्रचलित है।
क्या महिलाएँ विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर सकती हैं?
हाँ। यह भक्ति-स्तोत्र है और आज घरों व मन्दिरों में स्त्री-पुरुष सभी श्रद्धा से इसका पाठ करते हैं। स्वयं फलश्रुति इसे सबके लिए कल्याणकारी बताती है।
"श्रीराम राम रामेति" श्लोक का क्या महत्व है?
स्तोत्र के उत्तर भाग में पार्वती शिव से छोटा उपाय पूछती हैं, तो शिव कहते हैं कि "राम" नाम का जप सहस्रनाम के बराबर है। इसलिए जो पूरा पाठ न कर सकें, वे यह श्लोक तीन बार पढ़ते हैं।