अर्गला स्तोत्रम्

रूपं देहि जयं देहि — पच्चीस श्लोकों का पूरा पाठ

अर्गला स्तोत्रम् चण्डिका की स्तुति है, जिसे दुर्गा सप्तशती के आरंभिक पाठों में पढ़ा जाता है। यहाँ पच्चीस श्लोकों का चयनित पूरा क्रम, विनियोग, प्रणाम, रोमन लिपि और प्रत्येक पद का हिन्दी अर्थ है।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. ॐ अस्य श्रीअर्गलास्तोत्रमन्त्रस्य विष्णुर्ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीमहालक्ष्मीर्देवता, श्रीजगदम्बाप्रीतये सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः॥

    oṃ asya śrīargalāstotramantrasya viṣṇurṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ, śrīmahālakṣmīrdevatā, śrījagadambāprītaye saptaśatīpāṭhāṅgatvena jape viniyogaḥ||

    विनियोग में विष्णु ऋषि, अनुष्टुप् छंद और महालक्ष्मी देवता का नाम है; जगदम्बा की प्रसन्नता के लिए इसे सप्तशती-पाठ के अंग के रूप में रखा गया है।

  2. ॐ नमश्चण्डिकायै॥

    oṃ namaścaṇḍikāyai||

    चण्डिका को प्रणाम।

  3. मार्कण्डेय उवाच। ॐ जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी। दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥1॥

    mārkaṇḍeya uvāca| oṃ jayantī maṅgalā kālī bhadrakālī kapālinī| durgā kṣamā śivā dhātrī svāhā svadhā namo’stu te||1||

    मार्कण्डेय देवी को जयन्ती, मंगला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा नामों से प्रणाम करते हैं।

  4. जय त्वं देवि चामुण्डे जय भूतार्तिहारिणि। जय सर्वगते देवि कालरात्रि नमोऽस्तु ते॥2॥

    jaya tvaṃ devi cāmuṇḍe jaya bhūtārtihāriṇi| jaya sarvagate devi kālarātri namo’stu te||2||

    चामुण्डा की जय हो; प्राणियों का दुख हरने वाली, सर्वव्यापी कालरात्रि को प्रणाम।

  5. मधुकैटभविद्राविविधातृवरदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥3॥

    madhukaiṭabhavidrāvividhātṛvarade namaḥ| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||3||

    मधु-कैटभ को परास्त करने वाली और ब्रह्मा को वर देने वाली देवी को प्रणाम। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  6. महिषासुरनिर्णाशि भक्तानां सुखदे नमः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥4॥

    mahiṣāsuranirṇāśi bhaktānāṃ sukhade namaḥ| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||4||

    महिषासुर का विनाश करने वाली और भक्तों को सुख देने वाली देवी को प्रणाम। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  7. रक्तबीजवधे देवि चण्डमुण्डविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥5॥

    raktabījavadhe devi caṇḍamuṇḍavināśini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||5||

    रक्तबीज के वध और चण्ड-मुण्ड के विनाश से जुड़ी देवी को प्रणाम। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  8. शुम्भस्यैव निशुम्भस्य धूम्राक्षस्य च मर्दिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥6॥

    śumbhasyaiva niśumbhasya dhūmrākṣasya ca mardini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||6||

    शुम्भ, निशुम्भ और धूम्राक्ष को परास्त करने वाली देवी का आह्वान है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  9. वन्दिताङ्घ्रियुगे देवि सर्वसौभाग्यदायिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥7॥

    vanditāṅghriyuge devi sarvasaubhāgyadāyini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||7||

    जिनके दोनों चरण पूजित हैं और जो समस्त सौभाग्य देती हैं, उन देवी से प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  10. अचिन्त्यरूपचरिते सर्वशत्रुविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥8॥

    acintyarūpacarite sarvaśatruvināśini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||8||

    अचिन्त्य रूप और चरित्र वाली, सभी शत्रुओं का नाश करने वाली देवी से प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  11. नतेभ्यः सर्वदा भक्त्या चण्डिके दुरितापहे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥9॥

    natebhyaḥ sarvadā bhaktyā caṇḍike duritāpahe| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||9||

    भक्तिपूर्वक झुकने वालों का दुख-पाप हरने वाली चण्डिका से विनती है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  12. स्तुवद्भ्यो भक्तिपूर्वं त्वां चण्डिके व्याधिनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥10॥

    stuvadbhyo bhaktipūrvaṃ tvāṃ caṇḍike vyādhināśini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||10||

    भक्तिपूर्वक स्तुति करने वालों की व्याधि हरने वाली चण्डिका का स्तवन है। यह भक्ति की भाषा है, चिकित्सा का दावा नहीं। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  13. चण्डिके सततं ये त्वामर्चयन्तीह भक्तितः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥11॥

    caṇḍike satataṃ ye tvāmarcayantīha bhaktitaḥ| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||11||

    यह प्रार्थना उन लोगों को सामने रखती है जो निरंतर भक्तिभाव से चण्डिका की पूजा करते हैं। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  14. देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥12॥

    dehi saubhāgyamārogyaṃ dehi me paramaṃ sukham| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||12||

    सौभाग्य, आरोग्य और उत्तम सुख की प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  15. विधेहि द्विषतां नाशं विधेहि बलमुच्चकैः। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥13॥

    vidhehi dviṣatāṃ nāśaṃ vidhehi balamuccakaiḥ| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||13||

    द्वेषियों के प्रभाव का नाश और प्रबल बल देने की प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  16. विधेहि देवि कल्याणं विधेहि परमां श्रियम्। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥14॥

    vidhehi devi kalyāṇaṃ vidhehi paramāṃ śriyam| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||14||

    कल्याण और श्रेष्ठ समृद्धि देने की प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  17. सुरासुरशिरोरत्ननिघृष्टचरणेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥15॥

    surāsuraśiroratnanighṛṣṭacaraṇe’mbike| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||15||

    अम्बिका के चरणों को देवों और असुरों के मुकुट-रत्नों के स्पर्श से सुशोभित बताया है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  18. विद्यावन्तं यशस्वन्तं लक्ष्मीवन्तं जनं कुरु। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥16॥

    vidyāvantaṃ yaśasvantaṃ lakṣmīvantaṃ janaṃ kuru| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||16||

    ज्ञान, यश और लक्ष्मी-संपदा से सम्पन्न जीवन की विनती है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  19. प्रचण्डदैत्यदर्पघ्ने चण्डिके प्रणताय मे। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥17॥

    pracaṇḍadaityadarpaghne caṇḍike praṇatāya me| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||17||

    पराक्रमी दैत्यों के अहंकार को मिटाने वाली चण्डिका से झुककर विनती है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  20. चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥18॥

    caturbhuje caturvaktrasaṃstute parameśvari| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||18||

    चार भुजाओं वाली और चार मुख वाले ब्रह्मा से स्तुत परमेश्वरी से विनती है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  21. कृष्णेन संस्तुते देवि शश्वद्भक्त्या सदाम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥19॥

    kṛṣṇena saṃstute devi śaśvadbhaktyā sadāmbike| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||19||

    कृष्ण से नित्य भक्तिपूर्वक स्तुत अम्बिका को पुकारा गया है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  22. हिमाचलसुतानाथसंस्तुते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥20॥

    himācalasutānāthasaṃstute parameśvari| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||20||

    हिमालय की पुत्री के स्वामी शिव से स्तुत परमेश्वरी को पुकारा है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  23. इन्द्राणीपतिसद्भावपूजिते परमेश्वरि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥21॥

    indrāṇīpatisadbhāvapūjite parameśvari| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||21||

    इन्द्राणी के पति इन्द्र से श्रद्धापूर्वक पूजित परमेश्वरी से प्रार्थना है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  24. देवि प्रचण्डदोर्दण्डदैत्यदर्पविनाशिनि। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥22॥

    devi pracaṇḍadordaṇḍadaityadarpavināśini| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||22||

    अपनी पराक्रमी भुजाओं से दैत्यों का गर्व नष्ट करने वाली देवी का स्तवन है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  25. देवि भक्तजनोद्दामदत्तानन्दोदयेऽम्बिके। रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥23॥

    devi bhaktajanoddāmadattānandodaye’mbike| rūpaṃ dehi jayaṃ dehi yaśo dehi dviṣo jahi||23||

    भक्तों को भरपूर आनंद देने वाली अम्बिका को पुकारा है। सुन्दर स्वरूप, विजय और यश दें तथा द्वेषी बाधाएँ दूर करें।

  26. पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥24॥

    patnīṃ manoramāṃ dehi manovṛttānusāriṇīm| tāriṇīṃ durgasaṃsārasāgarasya kulodbhavām||24||

    यह पद अनुकूल मन वाली, सुन्दर पत्नी की कामना करता है और उसे कठिन संसार-सागर से पार कराने वाली कहता है। यह पुरुष वक्ता की पारंपरिक गृहस्थ-प्रार्थना है, सभी पाठकों पर विवाह या स्त्री की अधीनता का नियम नहीं।

  27. इदं स्तोत्रं पठित्वा तु महास्तोत्रं पठेन्नरः। स तु सप्तशतीसङ्ख्यावरमाप्नोति सम्पदाम्॥25॥

    idaṃ stotraṃ paṭhitvā tu mahāstotraṃ paṭhennaraḥ| sa tu saptaśatīsaṅkhyāvaramāpnoti sampadām||25||

    अंतिम पद इस स्तोत्र के बाद महास्तोत्र, अर्थात् सप्तशती, पढ़ने का क्रम बताकर श्रेष्ठ संपदा की प्राप्ति की महिमा कहता है। यह चयनित पच्चीस-श्लोकी अर्गला का समापन है।

अर्थ एवं महत्व

“रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि” इस स्तुति का आवर्ती आग्रह है। देवी के विविध नाम और महिषासुर, रक्तबीज, चण्ड-मुण्ड तथा शुम्भ-निशुम्भ की कथाएँ देवीमाहात्म्य की कथा-स्मृति से जुड़ी हैं। रूप, विजय, यश और सुरक्षा की याचना मूल पाठ की प्रार्थना है; यह परिणाम की गारंटी नहीं।

यह द्रिक पंचांग का पच्चीस-श्लोकी क्रम है: “जयन्ती मङ्गला” पहले और “जय त्वं देवि” दूसरे स्थान पर हैं। संस्कृत डॉक्यूमेंट्स में सत्ताईस श्लोक, पहले दो पदों का उल्टा क्रम, अलग धूम्रनेत्र-पद तथा पत्नी और संसार-सागर की दो अलग चौपंक्तियाँ मिलती हैं। वहाँ के अलग ध्यान-श्लोक इस चयनित पाठ की शुरुआत में नहीं जोड़े गए। दोनों क्रमों को चुपचाप मिलाया नहीं गया है।

यहाँ विनियोग और प्रणाम को भी क्रमांक दिए गए हैं; इसलिए मुख्य श्लोक १ तीसरे पाठ-खंड में है। पाठ किसी विशेष पुराण-संस्करण के अध्याय का स्वतंत्र ऐतिहासिक प्रमाण नहीं देता। सभी अर्थ मूल संस्कृत से स्वतंत्र रूप से लिखे गए हैं।

२५ मुख्य श्लोक; विनियोग और प्रणाम सहित २७ पाठ-खंड। अधिकांश पद अनुष्टुप् छंद में हैं।

पाठ विधि

विनियोग और प्रणाम के बाद पच्चीस श्लोक क्रम से पढ़ें। आवर्ती “रूपं देहि” पंक्ति जहाँ दी है वहाँ पूरी पढ़ें। सप्तशती के साथ पाठ-क्रम अपनी परंपरा के अनुसार रखें; इस पृष्ठ का उद्देश्य चयनित पाठ और उसका अर्थ उपलब्ध करना है।

सामान्य प्रश्न

अर्गला के २५ या २७ श्लोक क्यों मिलते हैं?
विभिन्न संग्रहों में क्रम और पद-विभाजन अलग हैं। यहाँ द्रिक पंचांग का पूरा पच्चीस-श्लोकी क्रम चुना है; विनियोग और प्रणाम मुख्य श्लोकों की गिनती से अलग हैं।
आवर्ती पंक्ति का अर्थ क्या है?
“रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि” रूप, विजय, यश देने और द्वेषी बाधाएँ दूर करने की प्रार्थना है।