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श्री गणेशाय नमः।
śrī gaṇeśāya namaḥ|
श्री गणेश को प्रणाम।
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ॐ अस्य श्रीकुञ्जिकास्तोत्रमन्त्रस्य सदाशिव ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः,
श्रीत्रिगुणात्मिका देवता, ॐ ऐं बीजं, ॐ ह्रीं शक्तिः, ॐ क्लीं कीलकम्,
मम सर्वाभीष्टसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः।
oṃ asya śrīkuñjikāstotramantrasya sadāśiva ṛṣiḥ, anuṣṭup chandaḥ,
śrītriguṇātmikā devatā, oṃ aiṃ bījaṃ, oṃ hrīṃ śaktiḥ, oṃ klīṃ kīlakam,
mama sarvābhīṣṭasiddhyarthe jape viniyogaḥ|
विनियोग में सदाशिव ऋषि, अनुष्टुप् छंद और त्रिगुणात्मिका देवी हैं। ऐं, ह्रीं और क्लीं को क्रमशः बीज, शक्ति और कीलक कहा गया है; अभिलषित सिद्धि के लिए जप का संकल्प है। बीजों का साधारण शब्दार्थ नहीं है।
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शिव उवाच।
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्॥१॥
śiva uvāca|
śṛṇu devi pravakṣyāmi kuñjikāstotramuttamam|
yena mantraprabhāveṇa caṇḍījāpaḥ śubho bhavet||1||
शिव देवी से कहते हैं: सुनो, मैं उत्तम कुञ्जिका स्तोत्र कहूँगा, जिसके मंत्र-प्रभाव से चण्डी का जप शुभ हो।
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न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥२॥
na kavacaṃ nārgalāstotraṃ kīlakaṃ na rahasyakam|
na sūktaṃ nāpi dhyānaṃ ca na nyāso na ca vārcanam||2||
पाठ अपने महत्व को बताते हुए कवच, अर्गला, कीलक, रहस्य, सूक्त, ध्यान, न्यास और अर्चना से अलग अपनी शक्ति का वर्णन करता है। अगला श्लोक इस कथन को पूरा करता है।
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कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥
kuñjikāpāṭhamātreṇa durgāpāṭhaphalaṃ labhet|
ati guhyataraṃ devi devānāmapi durlabham||3||
स्तुति कहती है कि कुञ्जिका-पाठ मात्र से दुर्गापाठ का फल मिलता है; इसे अत्यंत गोपनीय और देवों के लिए भी दुर्लभ कहा गया है। यह इसी पाठ का पारंपरिक महिमा-कथन है।
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गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥४॥
gopanīyaṃ prayatnena svayoniriva pārvati|
māraṇaṃ mohanaṃ vaśyaṃ stambhanoccāṭanādikam|
pāṭhamātreṇa saṃsiddhyet kuñjikāstotramuttamam||4||
पार्वती से इसे अपनी अंतरंगता की तरह सावधानी से गोपनीय रखने को कहा है। पाठ मारण, मोहन, वश्य, स्तम्भन और उच्चाटन जैसे तांत्रिक प्रयोगों की सिद्धि का दावा करता है। ये क्रमशः विनाश, सम्मोहन, वश में करना, रोकना और दूर करना जैसे पुराने प्रयोग-नाम हैं; यहाँ उनका ऐतिहासिक पाठ-संदर्भ समझाया गया है, प्रयोग-विधि नहीं।
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अथ मन्त्रः।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा॥५॥
इति मन्त्रः।
atha mantraḥ|
oṃ aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce|
oṃ glauṃ huṃ klīṃ jūṃ saḥ jvālaya jvālaya jvala jvala prajvala prajvala
aiṃ hrīṃ klīṃ cāmuṇḍāyai vicce jvala haṃ saṃ laṃ kṣaṃ phaṭ svāhā||5||
iti mantraḥ|
यह मुख्य मंत्र-भाग है। ऐं, ह्रीं, क्लीं तथा अन्य ध्वनियाँ बीजाक्षर हैं, सामान्य वाक्य नहीं; उनका काल्पनिक शब्दार्थ नहीं दिया गया है। “चामुण्डायै” चामुण्डा को संबोधित करता है; “ज्वालय, ज्वल, प्रज्वल” प्रज्वलित होने का आह्वान है। “फट्” और “स्वाहा” मंत्र के समापन-ध्वनि-रूप हैं।
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नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥६॥
namaste rudrarūpiṇyai namaste madhumardini|
namaḥ kaiṭabhahāriṇyai namaste mahiṣārdini||6||
रुद्रस्वरूप देवी, मधु का मर्दन करने वाली, कैटभ और महिषासुर को परास्त करने वाली को प्रणाम।
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नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे॥७॥
namaste śumbhahantryai ca niśumbhāsuraghātini|
jāgrataṃ hi mahādevi japaṃ siddhaṃ kurūṣva me||7||
शुम्भ और निशुम्भ का वध करने वाली महादेवी को प्रणाम; अपने जप को जागृत और सिद्ध करने की प्रार्थना है।
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ऐङ्कारी सृष्टिरूपायै ह्रीङ्कारी प्रतिपालिका।
क्लीङ्कारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥८॥
aiṅkārī sṛṣṭirūpāyai hrīṅkārī pratipālikā|
klīṅkārī kāmarūpiṇyai bījarūpe namo’stu te||8||
ऐं को सृष्टि, ह्रीं को पालन और क्लीं को कामरूप शक्ति से जोड़कर बीजरूप देवी को प्रणाम किया गया है। यह मंत्र की पारंपरिक प्रतीक-व्याख्या है, इन ध्वनियों का सामान्य शब्दकोश-अर्थ नहीं।
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चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥९॥
cāmuṇḍā caṇḍaghātī ca yaikārī varadāyinī|
vicce cābhayadā nityaṃ namaste mantrarūpiṇi||9||
चण्ड का वध करने वाली चामुण्डा, यै-ध्वनि से वर देने वाली और विच्चे से अभय देने वाली मंत्रस्वरूप देवी को प्रणाम।
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धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कुञ्जिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥१०॥
dhāṃ dhīṃ dhūṃ dhūrjaṭeḥ patnī vāṃ vīṃ vūṃ vāgadhīśvarī|
krāṃ krīṃ krūṃ kuñjikā devi śāṃ śīṃ śūṃ me śubhaṃ kuru||10||
धां-धीं-धूं, वां-वीं-वूं, क्रां-क्रीं-क्रूं और शां-शीं-शूं बीजध्वनियों के साथ शिव की पत्नी, वाणी की अधीश्वरी और कुञ्जिका देवी से मंगल की प्रार्थना है।
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हुं हुं हुङ्काररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥११॥
huṃ huṃ huṅkārarūpiṇyai jaṃ jaṃ jaṃ jambhanādinī|
bhrāṃ bhrīṃ bhrūṃ bhairavī bhadre bhavānyai te namo namaḥ||11||
हुं, जं और भ्रां-भ्रीं-भ्रूं जैसी ध्वनियों से संबद्ध देवी को नमस्कार है; भैरवी, भद्रा और भवानी नामों से उनकी स्तुति है। बीजों को सामान्य शब्दों में नहीं बदला गया है।
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अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षम्।
धिजाग्रम् धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥१२॥
aṃ kaṃ caṃ ṭaṃ taṃ paṃ yaṃ śaṃ vīṃ duṃ aiṃ vīṃ haṃ kṣam|
dhijāgram dhijāgraṃ troṭaya troṭaya dīptaṃ kuru kuru svāhā||12||
यह मंत्राक्षरों की क्रमावली है। “त्रोटय” तोड़ने और “दीप्तं कुरु” प्रकाशित करने का आह्वान है; शेष संयुक्त मंत्रध्वनियों का सीधा गद्य-अनुवाद नहीं है।
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पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा।
म्लां म्लीं म्लूं मूलविस्तीर्णा कुञ्जिकास्तोत्र हेतवे।
सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरूष्व मे॥१३॥
pāṃ pīṃ pūṃ pārvatī pūrṇā khāṃ khīṃ khūṃ khecarī tathā|
mlāṃ mlīṃ mlūṃ mūlavistīrṇā kuñjikāstotra hetave|
sāṃ sīṃ sūṃ saptaśatī devyā maṃtrasiddhiṃ kurūṣva me||13||
पार्वती, पूर्णा और खेचरी रूपों के साथ बीजध्वनियों का आह्वान है। चयनित पाठ में “मूलविस्तीर्णा” वाली पंक्ति भी है। देवी से सप्तशती के मंत्र-जप की सिद्धि की विनती की जाती है।
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कुञ्जिकायै नमो नमः।
इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥१४॥
kuñjikāyai namo namaḥ|
idaṃ tu kuñjikāstotraṃ mantrajāgartihetave|
abhakte naiva dātavyaṃ gopitaṃ rakṣa pārvati||14||
कुञ्जिका को प्रणाम करके पाठ कहता है कि यह स्तोत्र मंत्र-जागरण के लिए है। पार्वती से इसे भक्तिरहित व्यक्ति को न देने और सुरक्षित रखने का आग्रह है; यह इसकी गोपनीय साधना-परंपरा का कथन है।
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यस्तु कुञ्जिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥१५॥
yastu kuñjikayā devi hīnāṃ saptaśatīṃ paṭhet|
na tasya jāyate siddhiraraṇye rodanaṃ yathā||15||
अंतिम पद कुञ्जिका के बिना सप्तशती-पाठ को वन में रोने के समान निष्फल कहता है। यह इसी स्तोत्र की महिमा बताने की उपमा है, दूसरी मान्य पाठ-परंपराओं का ऐतिहासिक खंडन नहीं।
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इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे
कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
iti śrīrudrayāmale gaurītantre śivapārvatīsaṃvāde
kuñjikāstotraṃ sampūrṇam|
समापन इसे रुद्रयामल के गौरीतंत्र में शिव-पार्वती संवाद की परंपरा से जोड़ता है। किसी निश्चित पांडुलिपि या अध्याय की ऐतिहासिक पहचान यहाँ स्थापित नहीं की गई है।