गणेश चालीसा

श्री गणेश चालीसा (अर्थ सहित)

गणेश चालीसा भगवान गणेश की हिंदी स्तुति है, जो "जय गणपति सदगुण सदन" दोहे से आरंभ होकर उनके रूप, जन्म-कथा और बुद्धि की महिमा गाती है; इसे परंपरागत रूप से बुधवार, चतुर्थी और किसी शुभ कार्य के आरंभ में पढ़ा जाता है।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥

    Jai Gaṇapati sadaguṇa sadana, kavivara badana kṛpāla | Vighna haraṇa mangala karaṇa, jai jai Girijālāla ||

    हे सद्गुणों के धाम, श्रेष्ठ कवियों द्वारा वंदित, कृपालु गणपति, आपकी जय हो; विघ्न हरने वाले और मंगल करने वाले गिरिजानंदन, आपकी जय हो।

  2. जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥

    Jai jai jai Gaṇapati Gaṇarājū | Mangala bharaṇa karaṇa shubha kājū ||

    हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; आप जीवन को मंगल से भरते हैं और शुभ कार्य सिद्ध करते हैं।

  3. जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥

    Jai Gajabadana sadana sukhadātā | Vishva Vināyaka buddhi vidhātā ||

    हे गजमुख, सुख के धाम और सुख देने वाले, आपकी जय हो; आप संपूर्ण विश्व के विनायक और बुद्धि के दाता हैं।

  4. वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥

    Vakra tuṇḍa shuchi shuṇḍa suhāvana | Tilaka tripuṇḍa bhāla mana bhāvana ||

    आपका टेढ़ा मुख और पवित्र सूँड़ अत्यंत सुहावनी है; माथे पर त्रिपुंड तिलक मन को मोह लेता है।

  5. राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥

    Rājata maṇi muktana ura mālā | Svarṇa mukuṭa shira nayana vishālā ||

    आपके वक्ष पर मणियों और मोतियों की माला शोभित है; सिर पर स्वर्ण मुकुट है और नेत्र विशाल हैं।

  6. पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥

    Pustaka pāṇi kuṭhāra trishūlaṁ | Modaka bhoga sugandhita phūlaṁ ||

    आपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल अर्पित किए जाते हैं।

  7. सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥

    Sundara pītāmbara tana sājita | Charaṇa pādukā muni mana rājita ||

    आपके शरीर पर सुंदर पीला वस्त्र सजा है, और आपके चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में बसी रहती हैं।

  8. धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥

    Dhani Shivasuvana Ṣhaḍānana bhrātā | Gaurī lalana vishva-vikhyātā ||

    हे शिव के पुत्र और षडानन (कार्तिकेय) के भाई, आप धन्य हैं; हे गौरी के लाड़ले, आप पूरे विश्व में विख्यात हैं।

  9. ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥

    Ṛddhi Siddhi tava chaṁvara sudhāre | Mūṣhaka vāhana sohata dvāre ||

    ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं, और आपका वाहन मूषक द्वार पर शोभा पाता है।

  10. कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥

    Kahauṁ janma shubha kathā tumhārī | Ati shuchi pāvana mangalakārī ||

    अब मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र, पावन और मंगल करने वाली है।

  11. एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥

    Eka samaya Girirāja kumārī | Putra hetu tapa kīnho bhārī ||

    एक समय पर्वतराज की पुत्री पार्वती ने पुत्र की प्राप्ति के लिए कठोर तप किया।

  12. भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥

    Bhayo yagya jaba pūrṇa anūpā | Taba pahuṁchyo tuma dhari dvija rūpā ||

    जब उनका अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।

  13. अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥

    Atithi jāni kai Gauri sukhārī | Bahuvidhi sevā karī tumhārī ||

    आपको अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और उन्होंने अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।

  14. अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥

    Ati prasanna hvai tuma vara dīnhā | Mātu putra hita jo tapa kīnhā ||

    अत्यंत प्रसन्न होकर आपने उस तप का वर दिया जो माता ने पुत्र के लिए किया था।

  15. मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥

    Milahi putra tuhi buddhi vishālā | Binā garbha dhāraṇa yahi kālā ||

    आपने कहा कि तुम्हें इसी समय, बिना गर्भ धारण किए, विशाल बुद्धि वाला पुत्र प्राप्त होगा।

  16. गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥

    Gaṇanāyaka guṇa gyāna nidhānā | Pūjita prathama rūpa bhagavānā ||

    वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार, सबसे पहले पूजा जाने वाला और भगवान का ही रूप होगा।

  17. अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥

    Asa kahi antardhāna rūpa hvai | Palanā para bālaka svarūpa hvai ||

    ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए और पालने पर बालक के रूप में प्रकट हुए।

  18. बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥

    Bani shishu rudana jabahi tuma ṭhānā | Lakhi mukha sukha nahiṁ Gauri samānā ||

    शिशु बनकर जब आपने रोना शुरू किया, तब आपका मुख देखकर गौरी के आनंद की कोई सीमा न रही।

  19. सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥

    Sakala magana sukha mangala gāvahiṁ | Nabha te surana sumana varṣhāvahiṁ ||

    सब लोग आनंद में मग्न होकर मंगल-गीत गाने लगे और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।

  20. शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥

    Shambhu Umā bahu dāna luṭāvahiṁ | Sura munijana suta dekhana āvahiṁ ||

    शिव और उमा ने खुले हाथों से बहुत दान दिया, और देवता तथा मुनि पुत्र को देखने आने लगे।

  21. लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥

    Lakhi ati ānanda mangala sājā | Dekhana bhī āye Shani rājā ||

    इतना आनंद और मंगल-उत्सव देखकर राजा शनि भी बालक को देखने आए।

  22. निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥

    Nija avaguṇa guni Shani mana māhīṁ | Bālaka dekhana chāhata nāhīṁ ||

    अपनी दृष्टि के दोष को मन में विचार कर शनि बालक को देखना नहीं चाहते थे।

  23. गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥

    Girijā kachhu mana bheda baṛhāyo | Utsava mora na Shani tuhi bhāyo ||

    गिरिजा के मन में कुछ खिन्नता हुई और वे बोलीं, हे शनि, क्या तुम्हें मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा?

  24. कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥

    Kahana lage Shani mana sakuchāī | Kā karihau shishu mohi dikhāī ||

    शनि मन में संकोच करते हुए बोले, बालक को मुझे दिखाकर आप क्या करेंगी?

  25. नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥

    Nahiṁ vishvāsa Umā ura bhayaū | Shani soṁ bālaka dekhana kahāū ||

    उमा के मन में उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने के लिए कहा।

  26. पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥

    Paṛatahiṁ Shani dṛga koṇa prakāshā | Bālaka sira uṛi gayo akāshā ||

    शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।

  27. गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥

    Girijā girīṁ vikala hvai dharaṇī | So dukha dashā gayo nahiṁ varaṇī ||

    गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।

  28. हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥

    Hāhākāra machyo Kailāshā | Shani kīnhoṁ lakhi suta ko nāshā ||

    पूरे कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर ही पुत्र का नाश कर दिया।

  29. तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥

    Turata Garuṛa chaṛhi Viṣhṇu sidhāye | Kāṭi chakra so gaja shira lāye ||

    तुरंत भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और सुदर्शन चक्र से हाथी का सिर काटकर ले आए।

  30. बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥

    Bālaka ke dhaṛa ūpara dhārayo | Prāṇa mantra paṛhi Shankara ḍārayo ||

    वह सिर बालक के धड़ पर रखा गया, और शंकर ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें प्राण डाल दिए।

  31. नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥

    Nāma Gaṇesha Shambhu taba kīnhe | Prathama pūjya buddhi nidhi vara dīnhe ||

    तब शिव ने उनका नाम गणेश रखा और उन्हें प्रथम पूज्य तथा बुद्धि का भंडार होने का वर दिया।

  32. बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥

    Buddhi parīkṣhā jaba Shiva kīnhā | Pṛthvī kī pradakṣhiṇā līnhā ||

    जब शिव ने पुत्रों की बुद्धि की परीक्षा ली, तो पृथ्वी की परिक्रमा करने की शर्त रखी।

  33. चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥

    Chale Ṣhaḍānana bharami bhulāī | Rache baiṭha tuma buddhi upāī ||

    षडानन कार्तिकेय भ्रम में पड़कर पृथ्वी की परिक्रमा को चल दिए, जबकि आपने बैठे-बैठे बुद्धि से एक उपाय सोचा।

  34. चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥

    Charaṇa mātu-pitu ke dhara līnheṁ | Tinake sāta pradakṣhiṇa kīnheṁ ||

    आपने माता-पिता के चरण पकड़ लिए और उनकी सात परिक्रमाएँ कीं।

  35. धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥

    Dhani Gaṇesha kahi Shiva hiya haraṣhe | Nabha te surana sumana bahu barase ||

    धन्य हो गणेश, कहकर शिव का हृदय हर्षित हो उठा और आकाश से देवताओं ने बहुत फूल बरसाए।

  36. तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥

    Tumharī mahimā buddhi baṛāī | Sheṣha sahasa mukha sakai na gāī ||

    आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई का गान हजार मुखों वाले शेषनाग भी नहीं कर सकते।

  37. मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥

    Maiṁ mati hīna malīna dukhārī | Karahuṁ kauna vidhi vinaya tumhārī ||

    मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; मैं किस प्रकार आपकी विनती करूँ?

  38. भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥

    Bhajata Rāmasundara prabhudāsā | Jaga Prayāga Kakarā Durvāsā ||

    प्रभु के दास रामसुन्दर आपका भजन करते हैं, जिनका संबंध प्रयाग के निकट ककरा और दुर्वासा ऋषि के स्थान से बताया जाता है।

  39. अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥

    Aba prabhu dayā dīna para kījai | Apanī shakti bhakti kachhu dījai ||

    हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए और मुझे अपनी शक्ति और भक्ति का कुछ अंश दीजिए।

  40. श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥

    Shrī Gaṇesha yaha chālīsā, pāṭha karai kara dhyāna | Nita nava mangala gṛha basai, lahe jagata sanmāna ||

    जो श्री गणेश की यह चालीसा ध्यानपूर्वक पढ़ता है, उसके घर में नित्य नया मंगल बसता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।

  41. सम्वत अपन सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥

    Samvata apana sahasra dasha, Ṛṣhi Panchamī dinesha | Pūraṇa chālīsā bhayo, mangala mūrti Gaṇesha ||

    कवि द्वारा पहेली के रूप में बताए गए संवत में, ऋषि पंचमी के दिन रविवार को, मंगलमूर्ति गणेश की यह चालीसा पूर्ण हुई।

अर्थ एवं महत्व

गणेश चालीसा अवधी-ब्रज मिश्रित हिंदी की लोकप्रिय भक्ति-रचना है, जिसकी एक चौपाई में कवि "रामसुन्दर प्रभुदास" का नाम आता है। यह गणेश जी के मनोहर रूप के वर्णन से शुरू होकर उनकी जन्म-कथा को विस्तार से सुनाती है: पार्वती का तप, ब्राह्मण-अतिथि के रूप में गणेश का आगमन, शनि की दृष्टि से बालक का सिर कटना और विष्णु द्वारा गज-मस्तक लाकर शिव का उसे जीवित करना। यह कथा ब्रह्मवैवर्त पुराण के गणपति खंड वाली परंपरा से मेल खाती है। इसके बाद माता-पिता की परिक्रमा वाला प्रसंग बताता है कि गणेश प्रथम पूज्य और बुद्धि के देवता क्यों हैं। बुधवार, संकष्टी व विनायक चतुर्थी, गणेश चतुर्थी और नए कार्य के आरंभ में इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

आरंभ में एक दोहा, फिर ३८ चौपाइयाँ (प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ) और अंत में दो दोहे; भाषा अवधी-ब्रज मिश्रित हिंदी।

लाभ

  • परंपरागत रूप से इसे नए कार्य, परीक्षा, यात्रा या गृह-प्रवेश से पहले विघ्नों के निवारण की प्रार्थना के रूप में पढ़ा जाता है।
  • भक्तों की मान्यता है कि नियमित पाठ से बुद्धि, विवेक और एकाग्रता के लिए गणेश जी का आशीर्वाद मिलता है।
  • बुधवार और चतुर्थी पर इसका पाठ विशेष शुभ माना जाता है।
  • समापन दोहे के अनुसार श्रद्धा से पाठ करने वाले के घर में मंगल बसता है; भक्त इसे आस्था के रूप में मानते हैं।

पाठ विधि

स्नान के बाद गणेश जी के चित्र या प्रतिमा के सामने दीपक जलाएँ, दूर्वा, लाल फूल और मोदक या लड्डू अर्पित करें, फिर एकाग्र मन से पाठ करें। पाठ के बाद "जय गणेश जय गणेश देवा" आरती गाना प्रचलित है। चतुर्थी या गणेशोत्सव में अनेक भक्त प्रतिदिन एक, तीन या ग्यारह बार पाठ करते हैं।

सामान्य प्रश्न

गणेश चालीसा किसने लिखी?
चालीसा की एक चौपाई में "रामसुन्दर प्रभुदास" का नाम आता है, इसलिए इसे उन्हीं की रचना माना जाता है; उनके जीवन के बारे में अधिक प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
गणेश चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?
प्रचलित पाठ में आरंभ का एक दोहा, ३८ चौपाइयाँ और अंत के दो दोहे हैं; "चालीसा" नाम लगभग चालीस पदों की परंपरागत शैली को दर्शाता है।
गणेश चालीसा का पाठ किस दिन करना चाहिए?
परंपरागत रूप से बुधवार, संकष्टी और विनायक चतुर्थी तथा गणेश चतुर्थी विशेष माने जाते हैं; किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में भी इसका पाठ किया जाता है।
गणेश चालीसा के अनुसार गणेश जी को हाथी का सिर कैसे मिला?
चालीसा के अनुसार शनि की दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर उड़ गया, तब विष्णु गरुड़ पर जाकर हाथी का सिर लाए और शिव ने प्राण-मंत्र से उन्हें जीवित किया। यह ब्रह्मवैवर्त पुराण वाली परंपरा है; शिव पुराण में अलग कथा मिलती है।
क्या कोई भी गणेश चालीसा पढ़ सकता है?
हाँ, यह भक्ति-स्तुति है जिसके लिए किसी दीक्षा की आवश्यकता नहीं मानी जाती; बच्चे, बड़े, स्त्री-पुरुष सभी इसका पाठ करते हैं।