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जय गणपति सदगुण सदन, कविवर बदन कृपाल। विघ्न हरण मंगल करण, जय जय गिरिजालाल॥
Jai Gaṇapati sadaguṇa sadana, kavivara badana kṛpāla | Vighna haraṇa mangala karaṇa, jai jai Girijālāla ||
हे सद्गुणों के धाम, श्रेष्ठ कवियों द्वारा वंदित, कृपालु गणपति, आपकी जय हो; विघ्न हरने वाले और मंगल करने वाले गिरिजानंदन, आपकी जय हो।
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जय जय जय गणपति गणराजू। मंगल भरण करण शुभ काजू॥
Jai jai jai Gaṇapati Gaṇarājū | Mangala bharaṇa karaṇa shubha kājū ||
हे गणों के राजा गणपति, आपकी जय हो, जय हो, जय हो; आप जीवन को मंगल से भरते हैं और शुभ कार्य सिद्ध करते हैं।
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जय गजबदन सदन सुखदाता। विश्व विनायक बुद्धि विधाता॥
Jai Gajabadana sadana sukhadātā | Vishva Vināyaka buddhi vidhātā ||
हे गजमुख, सुख के धाम और सुख देने वाले, आपकी जय हो; आप संपूर्ण विश्व के विनायक और बुद्धि के दाता हैं।
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वक्र तुण्ड शुचि शुण्ड सुहावन। तिलक त्रिपुण्ड भाल मन भावन॥
Vakra tuṇḍa shuchi shuṇḍa suhāvana | Tilaka tripuṇḍa bhāla mana bhāvana ||
आपका टेढ़ा मुख और पवित्र सूँड़ अत्यंत सुहावनी है; माथे पर त्रिपुंड तिलक मन को मोह लेता है।
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राजत मणि मुक्तन उर माला। स्वर्ण मुकुट शिर नयन विशाला॥
Rājata maṇi muktana ura mālā | Svarṇa mukuṭa shira nayana vishālā ||
आपके वक्ष पर मणियों और मोतियों की माला शोभित है; सिर पर स्वर्ण मुकुट है और नेत्र विशाल हैं।
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पुस्तक पाणि कुठार त्रिशूलं। मोदक भोग सुगन्धित फूलं॥
Pustaka pāṇi kuṭhāra trishūlaṁ | Modaka bhoga sugandhita phūlaṁ ||
आपके हाथों में पुस्तक, फरसा और त्रिशूल हैं; आपको मोदक का भोग और सुगंधित फूल अर्पित किए जाते हैं।
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सुन्दर पीताम्बर तन साजित। चरण पादुका मुनि मन राजित॥
Sundara pītāmbara tana sājita | Charaṇa pādukā muni mana rājita ||
आपके शरीर पर सुंदर पीला वस्त्र सजा है, और आपके चरणों की पादुकाएँ मुनियों के मन में बसी रहती हैं।
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धनि शिवसुवन षडानन भ्राता। गौरी ललन विश्व-विख्याता॥
Dhani Shivasuvana Ṣhaḍānana bhrātā | Gaurī lalana vishva-vikhyātā ||
हे शिव के पुत्र और षडानन (कार्तिकेय) के भाई, आप धन्य हैं; हे गौरी के लाड़ले, आप पूरे विश्व में विख्यात हैं।
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ऋद्धि सिद्धि तव चँवर सुधारे। मूषक वाहन सोहत द्वारे॥
Ṛddhi Siddhi tava chaṁvara sudhāre | Mūṣhaka vāhana sohata dvāre ||
ऋद्धि और सिद्धि आप पर चँवर डुलाती हैं, और आपका वाहन मूषक द्वार पर शोभा पाता है।
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कहौं जन्म शुभ कथा तुम्हारी। अति शुचि पावन मंगलकारी॥
Kahauṁ janma shubha kathā tumhārī | Ati shuchi pāvana mangalakārī ||
अब मैं आपके जन्म की शुभ कथा कहता हूँ, जो अत्यंत पवित्र, पावन और मंगल करने वाली है।
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एक समय गिरिराज कुमारी। पुत्र हेतु तप कीन्हो भारी॥
Eka samaya Girirāja kumārī | Putra hetu tapa kīnho bhārī ||
एक समय पर्वतराज की पुत्री पार्वती ने पुत्र की प्राप्ति के लिए कठोर तप किया।
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भयो यज्ञ जब पूर्ण अनूपा। तब पहुँच्यो तुम धरि द्विज रूपा॥
Bhayo yagya jaba pūrṇa anūpā | Taba pahuṁchyo tuma dhari dvija rūpā ||
जब उनका अनुपम यज्ञ पूर्ण हुआ, तब आप ब्राह्मण का रूप धारण करके वहाँ पहुँचे।
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अतिथि जानि कै गौरि सुखारी। बहुविधि सेवा करी तुम्हारी॥
Atithi jāni kai Gauri sukhārī | Bahuvidhi sevā karī tumhārī ||
आपको अतिथि जानकर गौरी प्रसन्न हुईं और उन्होंने अनेक प्रकार से आपकी सेवा की।
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अति प्रसन्न ह्वै तुम वर दीन्हा। मातु पुत्र हित जो तप कीन्हा॥
Ati prasanna hvai tuma vara dīnhā | Mātu putra hita jo tapa kīnhā ||
अत्यंत प्रसन्न होकर आपने उस तप का वर दिया जो माता ने पुत्र के लिए किया था।
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मिलहि पुत्र तुहि बुद्धि विशाला। बिना गर्भ धारण यहि काला॥
Milahi putra tuhi buddhi vishālā | Binā garbha dhāraṇa yahi kālā ||
आपने कहा कि तुम्हें इसी समय, बिना गर्भ धारण किए, विशाल बुद्धि वाला पुत्र प्राप्त होगा।
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गणनायक गुण ज्ञान निधाना। पूजित प्रथम रूप भगवाना॥
Gaṇanāyaka guṇa gyāna nidhānā | Pūjita prathama rūpa bhagavānā ||
वह गणों का नायक, गुण और ज्ञान का भंडार, सबसे पहले पूजा जाने वाला और भगवान का ही रूप होगा।
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अस कहि अन्तर्धान रूप ह्वै। पलना पर बालक स्वरूप ह्वै॥
Asa kahi antardhāna rūpa hvai | Palanā para bālaka svarūpa hvai ||
ऐसा कहकर आप अंतर्धान हो गए और पालने पर बालक के रूप में प्रकट हुए।
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बनि शिशु रुदन जबहि तुम ठाना। लखि मुख सुख नहिं गौरि समाना॥
Bani shishu rudana jabahi tuma ṭhānā | Lakhi mukha sukha nahiṁ Gauri samānā ||
शिशु बनकर जब आपने रोना शुरू किया, तब आपका मुख देखकर गौरी के आनंद की कोई सीमा न रही।
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सकल मगन सुख मंगल गावहिं। नभ ते सुरन सुमन वर्षावहिं॥
Sakala magana sukha mangala gāvahiṁ | Nabha te surana sumana varṣhāvahiṁ ||
सब लोग आनंद में मग्न होकर मंगल-गीत गाने लगे और आकाश से देवता फूल बरसाने लगे।
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शम्भु उमा बहु दान लुटावहिं। सुर मुनिजन सुत देखन आवहिं॥
Shambhu Umā bahu dāna luṭāvahiṁ | Sura munijana suta dekhana āvahiṁ ||
शिव और उमा ने खुले हाथों से बहुत दान दिया, और देवता तथा मुनि पुत्र को देखने आने लगे।
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लखि अति आनन्द मंगल साजा। देखन भी आये शनि राजा॥
Lakhi ati ānanda mangala sājā | Dekhana bhī āye Shani rājā ||
इतना आनंद और मंगल-उत्सव देखकर राजा शनि भी बालक को देखने आए।
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निज अवगुण गुनि शनि मन माहीं। बालक देखन चाहत नाहीं॥
Nija avaguṇa guni Shani mana māhīṁ | Bālaka dekhana chāhata nāhīṁ ||
अपनी दृष्टि के दोष को मन में विचार कर शनि बालक को देखना नहीं चाहते थे।
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गिरिजा कछु मन भेद बढ़ायो। उत्सव मोर न शनि तुहि भायो॥
Girijā kachhu mana bheda baṛhāyo | Utsava mora na Shani tuhi bhāyo ||
गिरिजा के मन में कुछ खिन्नता हुई और वे बोलीं, हे शनि, क्या तुम्हें मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा?
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कहन लगे शनि मन सकुचाई। का करिहौ शिशु मोहि दिखाई॥
Kahana lage Shani mana sakuchāī | Kā karihau shishu mohi dikhāī ||
शनि मन में संकोच करते हुए बोले, बालक को मुझे दिखाकर आप क्या करेंगी?
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नहिं विश्वास उमा उर भयऊ। शनि सों बालक देखन कहाऊ॥
Nahiṁ vishvāsa Umā ura bhayaū | Shani soṁ bālaka dekhana kahāū ||
उमा के मन में उनकी बात पर विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने शनि से बालक को देखने के लिए कहा।
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पड़तहिं शनि दृग कोण प्रकाशा। बालक सिर उड़ि गयो अकाशा॥
Paṛatahiṁ Shani dṛga koṇa prakāshā | Bālaka sira uṛi gayo akāshā ||
शनि की तिरछी दृष्टि पड़ते ही बालक का सिर उड़कर आकाश में चला गया।
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गिरिजा गिरीं विकल ह्वै धरणी। सो दुख दशा गयो नहिं वरणी॥
Girijā girīṁ vikala hvai dharaṇī | So dukha dashā gayo nahiṁ varaṇī ||
गिरिजा व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ीं; उस दुःख की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।
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हाहाकार मच्यो कैलाशा। शनि कीन्हों लखि सुत को नाशा॥
Hāhākāra machyo Kailāshā | Shani kīnhoṁ lakhi suta ko nāshā ||
पूरे कैलाश पर हाहाकार मच गया कि शनि ने देखकर ही पुत्र का नाश कर दिया।
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तुरत गरुड़ चढ़ि विष्णु सिधाये। काटि चक्र सो गज शिर लाये॥
Turata Garuṛa chaṛhi Viṣhṇu sidhāye | Kāṭi chakra so gaja shira lāye ||
तुरंत भगवान विष्णु गरुड़ पर चढ़कर गए और सुदर्शन चक्र से हाथी का सिर काटकर ले आए।
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बालक के धड़ ऊपर धारयो। प्राण मन्त्र पढ़ि शंकर डारयो॥
Bālaka ke dhaṛa ūpara dhārayo | Prāṇa mantra paṛhi Shankara ḍārayo ||
वह सिर बालक के धड़ पर रखा गया, और शंकर ने प्राण-मंत्र पढ़कर उसमें प्राण डाल दिए।
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नाम गणेश शम्भु तब कीन्हे। प्रथम पूज्य बुद्धि निधि वर दीन्हे॥
Nāma Gaṇesha Shambhu taba kīnhe | Prathama pūjya buddhi nidhi vara dīnhe ||
तब शिव ने उनका नाम गणेश रखा और उन्हें प्रथम पूज्य तथा बुद्धि का भंडार होने का वर दिया।
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बुद्धि परीक्षा जब शिव कीन्हा। पृथ्वी की प्रदक्षिणा लीन्हा॥
Buddhi parīkṣhā jaba Shiva kīnhā | Pṛthvī kī pradakṣhiṇā līnhā ||
जब शिव ने पुत्रों की बुद्धि की परीक्षा ली, तो पृथ्वी की परिक्रमा करने की शर्त रखी।
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चले षडानन भरमि भुलाई। रचे बैठ तुम बुद्धि उपाई॥
Chale Ṣhaḍānana bharami bhulāī | Rache baiṭha tuma buddhi upāī ||
षडानन कार्तिकेय भ्रम में पड़कर पृथ्वी की परिक्रमा को चल दिए, जबकि आपने बैठे-बैठे बुद्धि से एक उपाय सोचा।
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चरण मातु-पितु के धर लीन्हें। तिनके सात प्रदक्षिण कीन्हें॥
Charaṇa mātu-pitu ke dhara līnheṁ | Tinake sāta pradakṣhiṇa kīnheṁ ||
आपने माता-पिता के चरण पकड़ लिए और उनकी सात परिक्रमाएँ कीं।
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धनि गणेश कहि शिव हिय हरषे। नभ ते सुरन सुमन बहु बरसे॥
Dhani Gaṇesha kahi Shiva hiya haraṣhe | Nabha te surana sumana bahu barase ||
धन्य हो गणेश, कहकर शिव का हृदय हर्षित हो उठा और आकाश से देवताओं ने बहुत फूल बरसाए।
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तुम्हरी महिमा बुद्धि बड़ाई। शेष सहस मुख सकै न गाई॥
Tumharī mahimā buddhi baṛāī | Sheṣha sahasa mukha sakai na gāī ||
आपकी महिमा और बुद्धि की बड़ाई का गान हजार मुखों वाले शेषनाग भी नहीं कर सकते।
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मैं मति हीन मलीन दुखारी। करहुँ कौन विधि विनय तुम्हारी॥
Maiṁ mati hīna malīna dukhārī | Karahuṁ kauna vidhi vinaya tumhārī ||
मैं बुद्धिहीन, मलिन और दुखी हूँ; मैं किस प्रकार आपकी विनती करूँ?
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भजत रामसुन्दर प्रभुदासा। जग प्रयाग ककरा दुर्वासा॥
Bhajata Rāmasundara prabhudāsā | Jaga Prayāga Kakarā Durvāsā ||
प्रभु के दास रामसुन्दर आपका भजन करते हैं, जिनका संबंध प्रयाग के निकट ककरा और दुर्वासा ऋषि के स्थान से बताया जाता है।
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अब प्रभु दया दीन पर कीजै। अपनी शक्ति भक्ति कुछ दीजै॥
Aba prabhu dayā dīna para kījai | Apanī shakti bhakti kachhu dījai ||
हे प्रभु, अब इस दीन पर दया कीजिए और मुझे अपनी शक्ति और भक्ति का कुछ अंश दीजिए।
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श्री गणेश यह चालीसा, पाठ करै कर ध्यान। नित नव मंगल गृह बसै, लहे जगत सन्मान॥
Shrī Gaṇesha yaha chālīsā, pāṭha karai kara dhyāna | Nita nava mangala gṛha basai, lahe jagata sanmāna ||
जो श्री गणेश की यह चालीसा ध्यानपूर्वक पढ़ता है, उसके घर में नित्य नया मंगल बसता है और उसे संसार में सम्मान मिलता है।
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सम्वत अपन सहस्र दश, ऋषि पंचमी दिनेश। पूरण चालीसा भयो, मंगल मूर्ति गणेश॥
Samvata apana sahasra dasha, Ṛṣhi Panchamī dinesha | Pūraṇa chālīsā bhayo, mangala mūrti Gaṇesha ||
कवि द्वारा पहेली के रूप में बताए गए संवत में, ऋषि पंचमी के दिन रविवार को, मंगलमूर्ति गणेश की यह चालीसा पूर्ण हुई।