शनि चालीसा

श्री शनि चालीसा (अर्थ सहित)

शनि चालीसा न्याय और कर्मफल के देवता शनिदेव की हिंदी स्तुति है, जो "जयति जयति शनिदेव दयाला" से आरंभ होकर उनके रूप, दस नामों और प्रभाव की कथाएँ गाती है; इसे परंपरागत रूप से शनिवार को और साढ़ेसाती या शनि-दशा में पढ़ा जाता है।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. जय गणेश गिरिजा सुवन, मंगल करण कृपाल। दीनन के दुख दूर करि, कीजै नाथ निहाल॥

    Jai Gaṇesha Girijā suvana, mangala karaṇa kṛpāla | Dīnana ke dukha dūra kari, kījai nātha nihāla ||

    हे गिरिजा के पुत्र, मंगल करने वाले कृपालु गणेश, आपकी जय हो; हे नाथ, दीनों के दुःख दूर कर उन्हें निहाल कीजिए।

  2. जय जय श्री शनिदेव प्रभु, सुनहु विनय महाराज। करहु कृपा हे रवि तनय, राखहु जन की लाज॥

    Jai jai Shrī Shanideva prabhu, sunahu vinaya mahārāja | Karahu kṛpā he Ravi tanaya, rākhahu jana kī lāja ||

    हे प्रभु श्री शनिदेव, आपकी जय हो; हे महाराज, मेरी विनती सुनिए। हे सूर्यपुत्र, कृपा कीजिए और अपने भक्त की लाज रखिए।

  3. जयति जयति शनिदेव दयाला। करत सदा भक्तन प्रतिपाला॥

    Jayati jayati Shanideva dayālā | Karata sadā bhaktana pratipālā ||

    हे दयालु शनिदेव, आपकी जय हो, जय हो; आप सदा अपने भक्तों का पालन और रक्षा करते हैं।

  4. चारि भुजा तनु श्याम विराजै। माथे रतन मुकुट छबि छाजै॥

    Chāri bhujā tanu shyāma virājai | Māthe ratana mukuṭa chhabi chhājai ||

    आपकी चार भुजाएँ हैं और श्याम वर्ण का शरीर शोभित है; माथे पर रत्नों का मुकुट अपनी छटा बिखेरता है।

  5. परम विशाल मनोहर भाला। टेढ़ी दृष्टि भृकुटि विकराला॥

    Parama vishāla manohara bhālā | Ṭeṛhī dṛṣhṭi bhṛkuṭi vikarālā ||

    आपका ललाट अत्यंत विशाल और मनोहर है; आपकी दृष्टि तिरछी और भौंहें भयंकर हैं।

  6. कुण्डल श्रवण चमाचम चमके। हिय माल मुक्तन मणि दमके॥

    Kuṇḍala shravaṇa chamāchama chamake | Hiya māla muktana maṇi damake ||

    कानों में कुंडल चमाचम चमकते हैं और हृदय पर मोतियों और मणियों की माला दमकती है।

  7. कर में गदा त्रिशूल कुठारा। पल बिच करैं अरिहिं संहारा॥

    Kara meṁ gadā trishūla kuṭhārā | Pala bicha karaiṁ arihiṁ sanhārā ||

    आपके हाथों में गदा, त्रिशूल और फरसा हैं, जिनसे आप पल भर में शत्रुओं का संहार कर देते हैं।

  8. पिंगल कृष्णो छाया नन्दन। यम कोणस्थ रौद्र दुखभंजन॥

    Pingala Kṛṣhṇo Chhāyā nandana | Yama Koṇastha Raudra dukhabhanjana ||

    पिंगल, कृष्ण, छायानंदन, यम, कोणस्थ, रौद्र और दुःखभंजन, ये आपके नाम हैं।

  9. सौरी मन्द शनी दश नामा। भानु पुत्र पूजहिं सब कामा॥

    Saurī Manda Shanī dasha nāmā | Bhānu putra pūjahiṁ saba kāmā ||

    सौरि, मंद और शनि मिलाकर ये आपके दस नाम हैं; सूर्यपुत्र की पूजा करने से सब कामनाएँ पूरी होती हैं, ऐसी मान्यता है।

  10. जा पर प्रभु प्रसन्न ह्वैं जाहीं। रंकहुँ राव करैं क्षण माहीं॥

    Jā para prabhu prasanna hvaiṁ jāhīṁ | Rankahuṁ rāva karaiṁ kṣhaṇa māhīṁ ||

    प्रभु जिस पर प्रसन्न हो जाते हैं, उस रंक को भी क्षण भर में राजा बना देते हैं।

  11. पर्वतहू तृण होइ निहारत। तृणहू को पर्वत करि डारत॥

    Parvatahū tṛṇa hoi nihārata | Tṛṇahū ko parvata kari ḍārata ||

    आपकी दृष्टि पड़ते ही पर्वत भी तिनका बन जाता है, और आप तिनके को भी पर्वत बना देते हैं।

  12. राज मिलत बन रामहिं दीन्हयो। कैकेइहुँ की मति हरि लीन्हयो॥

    Rāja milata bana Rāmahiṁ dīnhayo | Kaikeihuṁ kī mati hari līnhayo ||

    जब राम को राज्य मिलने वाला था, तब आपके प्रभाव से उन्हें वनवास मिला और कैकेयी की बुद्धि भी फिर गई।

  13. बनहूँ में मृग कपट दिखाई। मातु जानकी गई चुराई॥

    Banahūṁ meṁ mṛga kapaṭa dikhāī | Mātu Jānakī gaī churāī ||

    वन में भी कपट का मृग दिखाई दिया और माता जानकी का हरण हो गया।

  14. लखनहिं शक्ति विकल करिडारा। मचिगा दल में हाहाकारा॥

    Lakhanahiṁ shakti vikala kariḍārā | Machigā dala meṁ hāhākārā ||

    शक्ति-बाण ने लक्ष्मण को मूर्छित कर दिया और राम की सेना में हाहाकार मच गया।

  15. रावण की गति-मति बौराई। रामचन्द्र सों बैर बढ़ाई॥

    Rāvaṇa kī gati-mati baurāī | Rāmachandra soṁ baira baṛhāī ||

    रावण की चाल और बुद्धि भ्रमित हो गई, और उसने रामचंद्र से वैर बढ़ा लिया।

  16. दियो कीट करि कंचन लंका। बजि बजरंग बीर की डंका॥

    Diyo kīṭa kari kanchana Lankā | Baji Bajaranga bīra kī ḍankā ||

    सोने की लंका कीड़े के समान तुच्छ कर दी गई और वीर बजरंगबली की विजय का डंका बज उठा।

  17. नृप विक्रम पर तुहि पगु धारा। चित्र मयूर निगलि गै हारा॥

    Nṛpa Vikrama para tuhi pagu dhārā | Chitra mayūra nigali gai hārā ||

    जब आपने राजा विक्रमादित्य पर पग रखा, तो चित्र में बना मोर हार निगल गया।

  18. हार नौलखा लाग्यो चोरी। हाथ पैर डरवायो तोरी॥

    Hāra naulakhā lāgyo chorī | Hātha paira ḍaravāyo torī ||

    नौलखे हार की चोरी का आरोप उन पर लगा और उनके हाथ-पैर तुड़वा दिए गए।

  19. भारी दशा निकृष्ट दिखायो। तेलिहिं घर कोल्हू चलवायो॥

    Bhārī dashā nikṛṣhṭa dikhāyo | Telihiṁ ghara kolhū chalavāyo ||

    आपने उन्हें बहुत कठिन और हीन दशा दिखाई, यहाँ तक कि तेली के घर कोल्हू चलवाया।

  20. विनय राग दीपक महं कीन्हयों। तब प्रसन्न प्रभु ह्वै सुख दीन्हयों॥

    Vinaya rāga Dīpaka mahaṁ kīnhayoṁ | Taba prasanna prabhu hvai sukha dīnhayoṁ ||

    जब उन्होंने दीपक राग में आपकी विनती की, तब आप प्रसन्न हुए और उन्हें फिर से सुख दिया।

  21. हरिश्चन्द्र नृप नारि बिकानी। आपहुं भरें डोम घर पानी॥

    Harishchandra nṛpa nāri bikānī | Āpahuṁ bhareṁ Ḍoma ghara pānī ||

    राजा हरिश्चंद्र की पत्नी बिक गई और स्वयं उन्हें डोम के घर पानी भरना पड़ा।

  22. तैसे नल पर दशा सिरानी। भूंजी-मीन कूद गई पानी॥

    Taise Nala para dashā sirānī | Bhūñjī-mīna kūda gaī pānī ||

    वैसे ही राजा नल पर कठिन दशा आई, यहाँ तक कि भुनी हुई मछली भी उछलकर पानी में चली गई।

  23. श्री शंकरहिं गह्यो जब जाई। पारवती को सती कराई॥

    Shrī Shankarahiṁ gahyo jaba jāī | Pāravatī ko satī karāī ||

    जब आपका प्रभाव भगवान शंकर पर पड़ा, तब पार्वती (पूर्वजन्म में सती) को सती होना पड़ा।

  24. तनिक विलोकत ही करि रीसा। नभ उड़ि गयो गौरिसुत सीसा॥

    Tanika vilokata hī kari rīsā | Nabha uṛi gayo Gaurisuta sīsā ||

    रोष में आपके तनिक देखते ही गौरी-पुत्र गणेश का सिर आकाश में उड़ गया।

  25. पाण्डव पर भै दशा तुम्हारी। बची द्रौपदी होति उघारी॥

    Pāṇḍava para bhai dashā tumhārī | Bachī Draupadī hoti ughārī ||

    पांडवों पर आपकी दशा आई, तो द्रौपदी निर्वस्त्र होते-होते बची।

  26. कौरव के भी गति मति मारयो। युद्ध महाभारत करि डारयो॥

    Kaurava ke bhī gati mati mārayo | Yuddha Mahābhārata kari ḍārayo ||

    आपने कौरवों की भी चाल और बुद्धि हर ली, जिससे महाभारत का युद्ध हो गया।

  27. रवि कहँ मुख महँ धरि तत्काला। लेकर कूदि परयो पाताला॥

    Ravi kahaṁ mukha mahaṁ dhari tatkālā | Lekara kūdi parayo pātālā ||

    आपने तत्काल सूर्य को मुख में धर लिया और उन्हें लेकर पाताल में कूद पड़े।

  28. शेष देव-लखि विनती लाई। रवि को मुख ते दियो छुड़ाई॥

    Sheṣha deva-lakhi vinatī lāī | Ravi ko mukha te diyo chhuṛāī ||

    यह देखकर देवताओं ने विनती की, तब आपने सूर्य को अपने मुख से छोड़ दिया।

  29. वाहन प्रभु के सात सुजाना। जग दिग्गज गर्दभ मृग स्वाना॥

    Vāhana prabhu ke sāta sujānā | Jaga diggaja gardabha mṛga svānā ||

    प्रभु के सात प्रसिद्ध वाहन हैं, जिनमें दिग्गज हाथी, गधा, हिरण और कुत्ता शामिल हैं।

  30. जम्बुक सिंह आदि नख धारी। सो फल ज्योतिष कहत पुकारी॥

    Jambuka sinha ādi nakha dhārī | So phala jyotiṣha kahata pukārī ||

    सियार, सिंह आदि नख वाले पशु भी उनके वाहन हैं; ज्योतिष शास्त्र प्रत्येक वाहन का फल अलग बताता है।

  31. गज वाहन लक्ष्मी गृह आवैं। हय ते सुख सम्पत्ति उपजावैं॥

    Gaja vāhana Lakṣhmī gṛha āvaiṁ | Haya te sukha sampatti upajāvaiṁ ||

    परंपरा के अनुसार हाथी पर आगमन से घर में लक्ष्मी आती हैं और घोड़े पर आगमन सुख-संपत्ति लाता है।

  32. गर्दभ हानि करै बहु काजा। सिंह सिद्धकर राज समाजा॥

    Gardabha hāni karai bahu kājā | Sinha siddhakara rāja samājā ||

    गधे पर आगमन अनेक कार्यों में हानि करता है, जबकि सिंह पर आगमन राज-समाज में सफलता दिलाता है, ऐसा कहा गया है।

  33. जम्बुक बुद्धि नष्ट कर डारै। मृग दे कष्ट प्राण संहारै॥

    Jambuka buddhi naṣhṭa kara ḍārai | Mṛga de kaṣhṭa prāṇa sanhārai ||

    सियार पर आगमन बुद्धि को भ्रमित करता है और हिरण पर आगमन कष्ट देने वाला बताया गया है।

  34. जब आवहिं प्रभु स्वान सवारी। चोरी आदि होय डर भारी॥

    Jaba āvahiṁ prabhu svāna savārī | Chorī ādi hoya ḍara bhārī ||

    जब प्रभु कुत्ते की सवारी पर आते हैं, तब चोरी आदि का बड़ा भय बताया गया है।

  35. तैसहि चारि चरण यह नामा। स्वर्ण लौह चाँदी अरु तामा॥

    Taisahi chāri charaṇa yaha nāmā | Svarṇa lauha chāṁdī aru tāmā ||

    इसी प्रकार शनि के चार चरण (पाये) बताए गए हैं, जिनके नाम सोना, लोहा, चाँदी और ताँबा हैं।

  36. लौह चरण पर जब प्रभु आवैं। धन जन सम्पत्ति नष्ट करावैं॥

    Lauha charaṇa para jaba prabhu āvaiṁ | Dhana jana sampatti naṣhṭa karāvaiṁ ||

    कहा गया है कि जब प्रभु लोहे के पाये पर आते हैं, तब धन, जन और संपत्ति की हानि होती है।

  37. समता ताम्र रजत शुभकारी। स्वर्ण सर्व सुख मंगल भारी॥

    Samatā tāmra rajata shubhakārī | Svarṇa sarva sukha mangala bhārī ||

    ताँबे का पाया समता देने वाला और चाँदी का पाया शुभ माना गया है, जबकि सोने का पाया हर प्रकार का सुख और मंगल देता है।

  38. जो यह शनि चरित्र नित गावै। कबहुं न दशा निकृष्ट सतावै॥

    Jo yaha Shani charitra nita gāvai | Kabahuṁ na dashā nikṛṣhṭa satāvai ||

    जो प्रतिदिन शनि के इस चरित्र का गान करता है, उसे कठिन दशा कभी नहीं सताती, ऐसा कवि कहते हैं।

  39. अद्भुत नाथ दिखावैं लीला। करैं शत्रु के नशि बलि ढीला॥

    Adbhuta nātha dikhāvaiṁ līlā | Karaiṁ shatru ke nashi bali ḍhīlā ||

    नाथ अपनी अद्भुत लीला दिखाते हैं और शत्रु के बल को नष्ट कर उसे ढीला कर देते हैं।

  40. जो पण्डित सुयोग्य बुलवाई। विधिवत शनि ग्रह शांति कराई॥

    Jo paṇḍita suyogya bulavāī | Vidhivata Shani graha shānti karāī ||

    जो कोई योग्य पंडित को बुलाकर विधिपूर्वक शनि ग्रह की शांति कराता है,

  41. पीपल जल शनि दिवस चढ़ावत। दीप दान दै बहु सुख पावत॥

    Pīpala jala Shani divasa chaṛhāvata | Dīpa dāna dai bahu sukha pāvata ||

    और शनिवार को पीपल पर जल चढ़ाकर दीपदान करता है, वह बहुत सुख पाता है, ऐसा चालीसा कहती है।

  42. कहत राम सुन्दर प्रभु दासा। शनि सुमिरत सुख होत प्रकाशा॥

    Kahata Rāma Sundara prabhu dāsā | Shani sumirata sukha hota prakāshā ||

    प्रभु के दास रामसुन्दर कहते हैं कि शनि का स्मरण करने से सुख का प्रकाश होता है।

  43. पाठ शनिश्चर देव को, कीन्हों 'विमल' तैयार। करत पाठ चालीस दिन, हो भवसागर पार॥

    Pāṭha Shanishchara deva ko, kīnhoṁ 'Vimala' taiyāra | Karata pāṭha chālīsa dina, ho bhavasāgara pāra ||

    शनिश्चर देव का यह पाठ "विमल" ने तैयार किया है; चालीस दिन तक इसका पाठ करने वाला भवसागर से पार हो जाता है, ऐसी मान्यता है।

अर्थ एवं महत्व

शनि चालीसा हिंदी की लोकप्रिय भक्ति-रचना है, जिसकी अंतिम चौपाई में "रामसुन्दर प्रभुदास" और समापन दोहे में "विमल" का नाम आता है। यह गणेश-वंदना के दोहे से आरंभ होकर सूर्यपुत्र शनिदेव के श्याम, चतुर्भुज रूप और उनके दस नामों का वर्णन करती है। फिर यह राम, राजा विक्रमादित्य, हरिश्चंद्र, नल, पांडवों और स्वयं शिव-पार्वती से जुड़ी कथाएँ सुनाती है, जिनका भाव यह है कि देवता और राजा भी कर्म और समय के प्रभाव से परे नहीं हैं, और विनम्रता से संकट टलता है। इसके बाद ज्योतिष परंपरा में वर्णित शनि के वाहनों और पायों का उल्लेख आता है, और अंत में नियमित पाठ, पीपल पर जल और दीपदान जैसे भक्ति-उपाय बताए गए हैं। शनिवार की संध्या, शनि जयंती तथा साढ़ेसाती और ढैय्या के समय इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।

आरंभ में दो दोहे, फिर ४० चौपाइयाँ (प्रत्येक चरण में १६ मात्राएँ) और अंत में एक दोहा; भाषा अवधी-ब्रज मिश्रित हिंदी।

लाभ

  • भक्तों की मान्यता है कि शनिवार को श्रद्धा से पाठ करने पर शनिदेव की कृपा मिलती है और कठिन समय में धैर्य बना रहता है।
  • साढ़ेसाती, ढैय्या या शनि-दशा के समय इसे परंपरागत रूप से भक्ति-उपाय के रूप में पढ़ा जाता है।
  • चालीसा स्वयं चालीस दिन तक नियमित पाठ का संकल्प सुझाती है, जिसे भक्त अनुशासन और आस्था का अभ्यास मानते हैं।
  • शनि को कर्मफल का देवता माना जाता है, इसलिए अनेक भक्त इसका पाठ विनम्रता और सत्कर्म की प्रेरणा के लिए करते हैं।

पाठ विधि

शनिवार की संध्या को स्नान के बाद शनिदेव के चित्र के सामने या पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएँ और शांत मन से पाठ करें। परंपरा में काले तिल, उड़द या सरसों के तेल का दान भी किया जाता है। कई भक्त चालीसा के साथ हनुमान चालीसा भी पढ़ते हैं, और अनेक लोग चालीस दिन तक लगातार पाठ का संकल्प लेते हैं।

सामान्य प्रश्न

शनि चालीसा किसने लिखी?
अंतिम चौपाई में "रामसुन्दर प्रभुदास" और समापन दोहे में "विमल" का नाम आता है; परंपरा इन्हीं को इसका रचयिता मानती है, पर उनके जीवन के बारे में प्रामाणिक जानकारी बहुत कम है।
शनि चालीसा में कितनी चौपाइयाँ हैं?
प्रचलित पाठ में आरंभ के दो दोहे, चालीस चौपाइयाँ और अंत में एक दोहा है।
शनि चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?
परंपरागत रूप से शनिवार की संध्या, शनि जयंती और शनि अमावस्या को, तथा साढ़ेसाती या ढैय्या के समय इसका पाठ किया जाता है।
शनि चालीसा के साथ हनुमान जी की पूजा क्यों की जाती है?
लोक-परंपरा में मान्यता है कि शनिदेव ने हनुमान जी को वचन दिया था कि वे उनके भक्तों को कष्ट नहीं देंगे; इसलिए शनिवार को अनेक भक्त शनि चालीसा के साथ हनुमान चालीसा भी पढ़ते हैं।
क्या शनि चालीसा का पाठ करने से शनि-दोष निश्चित रूप से दूर हो जाता है?
यह आस्था और भक्ति का विषय है; भक्त इसे धैर्य, विनम्रता और सत्कर्म की प्रेरणा के रूप में पढ़ते हैं, किसी निश्चित परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।
क्या महिलाएँ शनि चालीसा पढ़ सकती हैं?
हाँ, चालीसा का पाठ सभी भक्त कर सकते हैं; कुछ स्थानों पर शनि-प्रतिमा के स्पर्श या तेल चढ़ाने को लेकर अलग रीतियाँ हैं, पर पाठ पर कोई रोक नहीं मानी जाती।