महालक्ष्मी अष्टकम्

नमस्तेऽस्तु महामाये — आठ मूल श्लोक और फलश्रुति

“नमस्तेऽस्तु महामाये” से शुरू होने वाला महालक्ष्मी अष्टकम् देवी महालक्ष्मी की आठ श्लोकों की स्तुति है। यहाँ आठ मूल श्लोक और तीन फलश्रुति श्लोक, सभी का सरल अर्थ तथा चयनित पाठ के स्रोत दिए हैं।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. नमस्तेऽस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते। शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Namaste’stu mahāmāye śrīpīṭhe surapūjite | Śaṅkhachakragadāhaste Mahālakṣmi namo’stu te ||

    हे महामाया, श्रीपीठ पर स्थित, देवताओं से पूजित और हाथों में शंख, चक्र तथा गदा धारण करने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  2. नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि। सर्वपापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Namaste garuḍārūḍhe kolāsurabhayaṅkari | Sarvapāpahare devi Mahālakṣmi namo’stu te ||

    गरुड़ पर आरूढ़, कोलासुर को भयभीत करने वाली और सभी पाप हरने वाली देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  3. सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि। सर्वदुःखहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Sarvajñe sarvavarade sarvaduṣṭabhayaṅkari | Sarvaduḥkhahare devi Mahālakṣmi namo’stu te ||

    सब जानने वाली, वर देने वाली, दुष्टों को भयभीत करने वाली और दुख हरने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  4. सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि। मन्त्रमूर्ते सदा देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Siddhibuddhiprade devi bhuktimuktipradāyini | Mantramūrte sadā devi Mahālakṣmi namo’stu te ||

    सिद्धि और बुद्धि देने वाली, भोग तथा मुक्ति प्रदान करने वाली और मंत्रस्वरूप देवी महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है। चयनित पाठ में “मन्त्रमूर्ते” है।

  5. आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्तिमहेश्वरि। योगजे योगसम्भूते महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Ādyantarahite devi ādyaśaktimaheśvari | Yogaje yogasambhūte Mahālakṣmi namo’stu te ||

    आदि और अंत से रहित, आद्यशक्ति और महेश्वरी, योग से प्रकट होने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  6. स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्तिमहोदरे। महापापहरे देवि महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Sthūlasūkṣmamahāraudre mahāśaktimahodare | Mahāpāpahare devi Mahālakṣmi namo’stu te ||

    स्थूल और सूक्ष्म रूपों में स्थित, उग्र स्वरूप वाली, महान शक्ति तथा विशाल गर्भ की उपमा से स्तुत, बड़े पापों को हरने वाली महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  7. पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि। परमेशि जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Padmāsanasthite devi parabrahmasvarūpiṇi | Parameśi jaganmātar Mahālakṣmi namo’stu te ||

    कमलासन पर स्थित, परब्रह्मस्वरूप, परमेश्वरी और जगत की माता महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है।

  8. श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते। जगत्स्थिते जगन्मातर्महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते॥

    Śvetāmbaradhare devi nānālaṅkārabhūṣite | Jagatsthite jaganmātar Mahālakṣmi namo’stu te ||

    श्वेत वस्त्र धारण किए, विविध आभूषणों से सुशोभित, जगत में स्थित और जगत की माता महालक्ष्मी, आपको नमस्कार है। यह आठवाँ मूल स्तुति-श्लोक है।

  9. महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः। सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोति सर्वदा॥

    Mahālakṣmyaṣṭakaṃ stotraṃ yaḥ paṭhed bhaktimān naraḥ | Sarvasiddhim avāpnoti rājyaṃ prāpnoti sarvadā ||

    फलश्रुति कहती है कि भक्तिपूर्वक इस अष्टकम् का पाठ करने वाला सिद्धि और राज्य पाता है। यह पाठ की पारंपरिक महिमा है, सत्ता या निश्चित सफलता का आश्वासन नहीं।

  10. एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्। द्विकालं यः पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः॥

    Ekakāle paṭhen nityaṃ mahāpāpavināśanam | Dvikālaṃ yaḥ paṭhen nityaṃ dhanadhānyasamanvitaḥ ||

    फलश्रुति में प्रतिदिन एक समय पाठ को पाप-विनाश और दो समय पाठ को धन-धान्य से जोड़ा गया है। ये भक्तिपरक फल-कथन हैं।

  11. त्रिकालं यः पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्। महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥

    Trikālaṃ yaḥ paṭhen nityaṃ mahāśatruvināśanam | Mahālakṣmīr bhaven nityaṃ prasannā varadā śubhā ||

    तीन समय पाठ की पारंपरिक महिमा में शत्रु-बाधा के नाश और महालक्ष्मी के प्रसन्न, शुभ तथा वरदायिनी होने का भाव है। यही चयनित पाठ का तीसरा समापन श्लोक है।

अर्थ एवं महत्व

आठ मूल श्लोक बार-बार “महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते” कहकर देवी को प्रणाम करते हैं। वे उनके स्वरूप, ज्ञान, शक्ति, पालन और मुक्ति के भावों को सामने रखते हैं। आठवें श्लोक के बाद तीन फलश्रुति श्लोक हैं; वे मूल अष्टक की गिनती से अलग समापन-भाग हैं।

यह “नमस्तेऽस्तु महामाये” वाला पाठ है, समान शीर्षक वाले किसी दूसरे लक्ष्मी अष्टक का स्थानापन्न नहीं। द्रिक पंचांग की क्रमावली को संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के इसी पाठ से मिलाया गया है। “मन्त्रमूर्ते” के लिए “मन्त्रपूते”, सातवें श्लोक में “जगन्मातर्” के लिए “जगन्माता” और समापन में संयुक्त शब्दों के कुछ भेद मिलते हैं। यहाँ चुने हुए पाठ की पंक्तियाँ रखी गई हैं।

समापन-परंपरा इसे इन्द्रकृत कहती है। यहाँ किसी विशिष्ट पुराण-संस्करण का अध्याय प्रमाणित किए बिना निश्चित ग्रंथ-अध्याय का दावा नहीं है। फलश्रुति का अर्थ भक्तिपरक संदर्भ में पढ़ें; धन या अन्य परिणाम की गारंटी के रूप में नहीं।

आठ मुख्य श्लोक; उनके बाद तीन फलश्रुति श्लोक अलग समापन-भाग हैं।

पाठ विधि

आठ मूल श्लोक क्रम से पढ़ें और चाहें तो उनके बाद चयनित पाठ की फलश्रुति पढ़ें। अर्थ से यह पहचान सकते हैं कि मुख्य स्तवन कहाँ समाप्त होता है। पूजा-क्रम और पाठ की गिनती अपनी परंपरा के अनुसार रखें; समापन में बताए फल सबके लिए निश्चित परिणाम का वादा नहीं हैं।

सामान्य प्रश्न

अष्टकम् में ग्यारह श्लोक क्यों दिए हैं?
अष्टकम् के मूल स्तवन में आठ श्लोक हैं। चयनित संग्रह में उनके बाद तीन फलश्रुति श्लोक आते हैं। यहाँ दोनों भाग पूरे दिए हैं और उनका अंतर बताया है।
क्या सभी लक्ष्मी अष्टक यही पाठ हैं?
नहीं। समान नाम से अलग स्तुतियाँ भी मिलती हैं। इस पृष्ठ का पाठ “नमस्तेऽस्तु महामाये” से आरंभ होता है; आरंभिक पंक्ति देखकर ग्रंथ की पहचान करें।