हनुमान जी की आरती

आरती कीजै हनुमान लला की — संपूर्ण पाठ व अर्थ

“आरती कीजै हनुमान लला की” हनुमान जी की स्तुति है, जो उनकी शक्ति, श्रीराम की सेवा और भक्तों की सहायता का स्मरण करती है। यहाँ चयनित आरती संग्रह का पूरा पाठ, टेक और सात पाठ-खंडों के सरल अर्थ हैं।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. आरति कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

    Ārati kījai Hanumān lalā kī | Dushṭ dalan Raghunāth kalā kī ||

    श्रीराम की शक्ति से जुड़े और दुष्टता का नाश करने वाले हनुमान जी की आरती करें। “लला” प्रेमपूर्ण संबोधन है।

  2. जाके बल से गिरिवर काँपे, रोग दोष जाके निकट न झाँके। अंजनि पुत्र महा बलदायी, संतन के प्रभु सदा सहायी। आरति कीजै हनुमान लला की॥

    Jāke bal se girivar kā̃pe, rog dosh jāke nikaṭ na jhā̃ke | Anjani putra mahā baldāyī, santan ke prabhu sadā sahāyī | Ārati kījai Hanumān lalā kī ||

    आरती हनुमान के बल को पर्वतों को कंपा देने वाला कहती है और रोग-दोष से रक्षा की भावना व्यक्त करती है। अंजनी के पुत्र संतों के सहायक और बल देने वाले प्रभु के रूप में स्मरण किए गए हैं।

  3. दे बीड़ा रघुनाथ पठाये, लंका जाय सिया सुधि लाये। लंका सौ कोटि समुद्र सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई। आरति कीजै हनुमान लला की॥

    De bīṛā Raghunāth paṭhāye, Lankā jāy Siyā sudhi lāye | Lankā sau koṭi samudra sī khāī, jāt Pavansut bār na lāī | Ārati kījai Hanumān lalā kī ||

    श्रीराम का कार्य स्वीकार कर हनुमान लंका जाते हैं और सीता की खबर लाते हैं। कठिन समुद्री दूरी को लाँघने में पवनपुत्र की तत्परता और सामर्थ्य का वर्णन है; “सौ कोटि” स्रोत की काव्यात्मक पंक्ति है।

  4. लंका जारि असुर संघारे, सिया रामजी के काज संवारे। लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे, आन संजीवन प्राण उबारे। आरति कीजै हनुमान लला की॥

    Lankā jāri asur sanghāre, Siyā Rāmjī ke kāj sãvāre | Lakshman mūrchhit paṛe sakāre, ān sanjīvan prān ubāre | Ārati kījai Hanumān lalā kī ||

    पद लंका-दहन और श्रीराम-सीता के कार्यों में हनुमान की सेवा को याद करता है। मूर्छित लक्ष्मण के लिए संजीवनी लाकर प्राण बचाने की कथा का स्मरण है।

  5. पैठि पाताल तोड़ि यम कारे, अहिरावन की भुजा उखारे। बाँये भुजा असुरदल मारे, दाहिने भुजा संत जन तारे। आरति कीजै हनुमान लला की॥

    Paiṭhi pātāl toṛi Yam kāre, Ahirāvan kī bhujā ukhāre | Bā̃ye bhujā asurdal māre, dāhine bhujā sant jan tāre | Ārati kījai Hanumān lalā kī ||

    इस पद में पाताल में प्रवेश, बंधन तोड़ने और अहिरावण पर विजय का उल्लेख है। एक भुजा से दुष्टों का दमन और दूसरी से संतों की रक्षा का चित्र हनुमान के रक्षक रूप को व्यक्त करता है। यह प्रसंग अलग रामकथा-परंपराओं में भिन्न मिलता है।

  6. सुर नर मुनि जन आरति उतारे, जय जय जय हनुमान उचारे। कंचन थार कपूर लौ छाई, आरती करति अंजना माई। आरति कीजै हनुमान लला की॥

    Sur nar muni jan ārati utāre, jai jai jai Hanumān uchāre | Kanchan thār kapūr lau chhāī, āratī karati Anjanā māī | Ārati kījai Hanumān lalā kī ||

    देवता, मनुष्य और मुनि हनुमान की जय कहते हुए आरती करते हैं। स्वर्ण थाल में कपूर की लौ और माता अंजना की आरती का भक्तिपूर्ण दृश्य है।

  7. जो हनुमान जी की आरति गावे, बसि वैकुण्ठ परम पद पावे। आरति कीजै हनुमान लला की। दुष्ट दलन रघुनाथ कला की॥

    Jo Hanumān jī kī ārati gāve, basi Vaikunṭh param pad pāve | Ārati kījai Hanumān lalā kī | Dushṭ dalan Raghunāth kalā kī ||

    समापन आरती गाने वाले के लिए वैकुण्ठ और परम पद का पारंपरिक भक्ति-फल बताता है। अंत में आरंभिक टेक फिर आता है।

अर्थ एवं महत्व

आरती में हनुमान की शक्ति का केंद्र श्रीराम की सेवा और भक्तों की रक्षा है। सीता की खोज, लंका-दहन और संजीवनी जैसे प्रसंग उसी सेवा को स्मरण कराते हैं। रोग-दोष और परम पद की पंक्तियाँ भक्तिपरक स्तुति की भाषा हैं, चिकित्सा या निश्चित परिणाम का आश्वासन नहीं।

पाठ संस्कृत डॉक्यूमेंट्स के आरती संग्रह के अनुसार समूहबद्ध है। द्रिक पंचांग में “दे बीरा … लंका जारि”, “लंका सो कोट” और “तोरि जम-कारे” जैसे पाठभेद हैं; यहाँ संग्रह के “दे बीड़ा … लंका जाय”, “लंका सौ कोटि” और “तोड़ि यम कारे” रखे हैं। टेक तथा अंत की पंक्तियाँ पूरी दी गई हैं।

पाठ विधि

अपनी परंपरा में पूजा या हनुमान पाठ के बाद आरती पढ़ें या गाएँ। टेक “आरति कीजै हनुमान लला की” है। दीप का प्रयोग सुरक्षित ढंग से करें। मंगलवार, शनिवार या हनुमान जयंती पर पाठ की परंपराएँ हैं, पर इस पृष्ठ का पाठ किसी एक दिन तक सीमित नहीं है।

सामान्य प्रश्न

क्या आरती के साथ टेक दोहराना चाहिए?
चयनित संग्रह में टेक कई पदों के बाद आता है और यहाँ उसे रखा गया है। गायन में परिवार या मंदिर अपनी परिचित लय और दोहराव का अनुसरण कर सकते हैं।
अहिरावण का प्रसंग क्या सभी रामायणों में है?
नहीं, रामकथा की अलग परंपराओं में प्रसंग और नाम बदलते हैं। यहाँ अहिरावण उस आरती की पंक्ति के संदर्भ में समझाया गया है; इसे हर रामायण संस्करण का प्रसंग नहीं कहा गया है।