बजरंग बाण

श्री बजरंग बाण — सम्पूर्ण पाठ (अर्थ सहित)

बजरंग बाण हनुमान जी को समर्पित अवधी भाषा की एक उग्र प्रार्थना है — एक आरंभिक दोहा, चौंतीस चौपाइयाँ और एक समापन दोहा — जिसे भक्त गंभीर संकट, भय या बाधा के समय हनुमान जी को शीघ्र सहायता हेतु पुकारने के लिए पढ़ते हैं।

संपूर्ण पाठ

पाठ पढ़ने के विकल्प
  1. निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥

    Nishchaya prema pratīti te, binaya karai sanamāna | Tehi ke kāraja sakala shubha, siddha karai Hanumāna ||

    जो निश्चय, प्रेम और विश्वास के साथ आदरपूर्वक विनती करता है, उसके सब शुभ कार्य हनुमान सिद्ध कर देते हैं।

  2. जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥

    Jai Hanumanta santa hitakārī | Suna lījai prabhu araja hamārī ||

    हे संतों का हित करने वाले हनुमंत, आपकी जय हो; प्रभु, हमारी विनती सुन लीजिए।

  3. जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥

    Jana ke kāja bilamba na kījai | Ātura dauri mahā sukha dījai ||

    अपने भक्त का काम करने में देर न कीजिए; शीघ्र दौड़कर आइए और परम सुख दीजिए।

  4. जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥

    Jaise kūdi sindhu mahipārā | Surasā badana paithi bistārā ||

    आप एक छलाँग में समुद्र के उस पार पहुँच गए, और सुरसा के फैलते मुख में प्रवेश करके सकुशल बाहर निकल आए।

  5. आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥

    Āge jāya Lankinī rokā | Mārehu lāta gaī suralokā ||

    आगे बढ़ने पर लंकिनी ने आपको रोका, तो आपके एक प्रहार से वह देवलोक चली गई।

  6. जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥

    Jāya Bibhīshana ko sukha dīnhā | Sītā nirakhi paramapada līnhā ||

    आपने जाकर विभीषण को सुख दिया और सीताजी के दर्शन कर परम आनंद पाया।

  7. बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥

    Bāga ujāri sindhu maha borā | Ati ātura jamakātara torā ||

    आपने अशोक-वाटिका उजाड़कर (उसके वृक्ष) समुद्र में डुबो दिए और बड़ी फुर्ती से यम के समान भयानक राक्षसों को तोड़ डाला।

  8. अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥

    Akshaya kumāra māri sanhārā | Lūma lapeti Lanka ko jārā ||

    आपने रावण-पुत्र अक्षयकुमार का वध किया और पूँछ में आग लपेटकर लंका जला दी।

  9. लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥

    Lāha samāna Lanka jari gaī | Jaya jaya dhuni surapura nabha bhaī ||

    लंका लाख की तरह जल उठी, और देवलोक तथा आकाश में जय-जयकार की ध्वनि गूँज उठी।

  10. अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥

    Aba bilamba kehi kārana svāmī | Kripā karahu ura antarayāmī ||

    हे स्वामी, अब देर किस कारण से हो रही है? हे हृदय की बात जानने वाले, कृपा कीजिए।

  11. जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥

    Jaya jaya Lakhana prāna ke dātā | Ātura hvai dukha karahu nipātā ||

    लक्ष्मण को प्राण देने वाले, आपकी जय हो! शीघ्रता करके मेरे दुखों का नाश कीजिए।

  12. जै हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥

    Jai Hanumāna jayati bala-sāgara | Sura-samūha-samaratha bhata-nāgara ||

    हे बल के सागर हनुमान, आपकी जय हो; आप देवताओं के समूह की सहायता में समर्थ और योद्धाओं में श्रेष्ठ हैं।

  13. ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥

    Om hanu hanu hanu Hanumanta hathīle | Bairihi māru bajra kī kīle ||

    हे दृढ़-निश्चयी हनुमंत! (बीज-ध्वनि "हनु" के साथ आह्वान) — वज्र की कील के समान प्रहार कर शत्रु को नष्ट कीजिए।

  14. गदा बज्र लै बैरिहिं मारो। महाराज प्रभु दास उबारो॥

    Gadā bajra lai bairihi māro | Mahārāja prabhu dāsa ubāro ||

    वज्र जैसी गदा लेकर शत्रु का नाश कीजिए; हे महाराज, हे प्रभु, अपने दास का उद्धार कीजिए।

  15. ॐकार हुंकार महाप्रभु धावो। बज्र गदा हनु बिलंब न लावो॥

    Omkāra hunkāra mahāprabhu dhāvo | Bajra gadā hanu bilamba na lāvo ||

    हे महाप्रभु, ओंकार और हुंकार करते हुए दौड़कर आइए; वज्र-गदा से प्रहार करने में विलंब न कीजिए।

  16. ॐ ह्रीं ह्रीं ह्रीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥

    Om hrīm hrīm hrīm Hanumanta kapīsā | Om hum hum hum hanu ari ura sīsā ||

    बीज-मंत्रों "ह्रीं" और "हुं" के साथ कपिराज हनुमान का आह्वान — शत्रु के हृदय और सिर पर प्रहार कीजिए।

  17. सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥

    Satya hohu Hari sapatha pāi kai | Rāma dūta dharu māru dhāi kai ||

    प्रभु श्रीराम की शपथ पाकर अपना वचन सत्य कीजिए; हे रामदूत, दौड़कर शत्रु को पकड़िए और परास्त कीजिए।

  18. जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥

    Jaya jaya jaya Hanumanta agādhā | Dukha pāvata jana kehi aparādhā ||

    हे अथाह महिमा वाले हनुमंत, आपकी जय हो! आपका भक्त किस अपराध के कारण दुख पा रहा है?

  19. पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥

    Pūjā japa tapa nema achārā | Nahi jānata kachhu dāsa tumhārā ||

    पूजा, जप, तप, नियम और आचार — आपका यह दास इनमें से कुछ भी नहीं जानता।

  20. बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥

    Bana upabana maga giri griha māhī | Tumhare bala hau darapata nāhī ||

    वन, उपवन, मार्ग, पर्वत या घर — कहीं भी आपके बल के भरोसे मैं नहीं डरता।

  21. जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥

    Jaya Anjani kumāra balavantā | Shankarasuvana bīra Hanumantā ||

    हे बलवान अंजनि-पुत्र, शंकर के अंश, वीर हनुमान — आपकी जय हो।

  22. बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥

    Badana karāla kāla-kula-ghālaka | Rāma sahāya sadā pratipālaka ||

    आपका विकराल रूप मृत्यु के समूह का भी नाश करने वाला है; आप श्रीराम के सहायक और सदा रक्षा करने वाले हैं।

  23. भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥

    Bhūta, preta, pisācha nisāchara | Agina betāla kāla mārī mara ||

    भूत, प्रेत, पिशाच, निशाचर, अग्नि-बेताल, अकाल-मृत्यु और महामारी — ये सब भय के रूप हैं (जिनसे रक्षा की प्रार्थना की जाती है)।

  24. इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥

    Inhe māru, tohi sapatha Rāma kī | Rākhu nātha marajāda nāma kī ||

    इन सब (भयों) का नाश कीजिए — आपको श्रीराम की शपथ है; हे नाथ, अपने नाम की मर्यादा रखिए।

  25. जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥

    Janakasutā Hari dāsa kahāvau | Tākī sapatha bilamba na lāvau ||

    आप जनकनंदिनी सीता और प्रभु श्रीराम के दास कहलाते हैं; उनकी शपथ है, अब देर न कीजिए।

  26. जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥

    Jai jai jai dhuni hota akāsā | Sumirata hoya dusaha dukha nāsā ||

    आकाश में आपकी जय-जयकार गूँजती है; आपका स्मरण करते ही असहनीय दुख भी नष्ट हो जाता है।

  27. चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥

    Charana pakari, kara jori manāvau | Yahi ausara aba kehi goharāvau ||

    आपके चरण पकड़कर, हाथ जोड़कर आपको मनाता हूँ — इस घड़ी में आपके सिवा और किसे पुकारूँ?

  28. उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥

    Uthu, uthu, chalu, tohi Rāma duhāī | Pāya parau, kara jori manāī ||

    उठिए, उठिए, चलिए — आपको श्रीराम की दुहाई है! मैं आपके पैरों पड़ता हूँ और हाथ जोड़कर मनाता हूँ।

  29. ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥

    Om cham cham cham cham chapala chalantā | Om hanu hanu hanu hanu Hanumantā ||

    बीज-ध्वनियों के साथ आह्वान — हे फुर्तीले, तीव्र गति से चलने वाले हनुमंत, आइए!

  30. ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥

    Om ham ham hānka deta kapi chanchala | Om sam sam sahami parāne khala-dala ||

    जब चंचल कपि हुंकार भरते हैं, तो दुष्टों के दल भयभीत होकर भाग खड़े होते हैं।

  31. अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥

    Apane jana ko turata ubārau | Sumirata hoya ānanda hamārau ||

    अपने भक्त का तुरंत उद्धार कीजिए; आपका स्मरण करते ही हमें आनंद प्राप्त हो।

  32. यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥

    Yaha Bajaranga-bāna jehi mārai | Tāhi kahau phiri kavana ubārai ||

    यह बजरंग-बाण जिस (बुराई) पर चलता है, उसे फिर कौन बचा सकता है?

  33. पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥

    Pātha karai Bajaranga-bāna kī | Hanumata rakshā karai prāna kī ||

    जो बजरंग बाण का पाठ करता है, हनुमान जी उसके प्राणों की रक्षा करते हैं — ऐसी भक्तों की मान्यता है।

  34. यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब काँपैं॥

    Yaha Bajaranga bāna jo jāpai | Tāso bhūta-preta saba kāmpai ||

    जो यह बजरंग बाण जपता है, उससे सब भूत-प्रेत काँपते हैं।

  35. धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥

    Dhūpa deya jo japai hamesā | Tāke tana nahi rahai kalesā ||

    जो धूप अर्पित करके सदा इसका जप करता है, उसके शरीर में क्लेश नहीं रहता — ऐसी परंपरागत मान्यता है।

  36. उर प्रतीति दृढ़, सरन ह्वै, पाठ करै धरि ध्यान। बाधा सब हर, करैं सब काम सफल हनुमान॥

    Ura pratīti dridha, sarana hvai, pātha karai dhari dhyāna | Bādhā saba hara, karai saba kāma saphala Hanumāna ||

    जो हृदय में दृढ़ विश्वास रखकर, शरणागत होकर, ध्यानपूर्वक पाठ करता है, हनुमान उसकी सब बाधाएँ हरकर सब काम सफल करते हैं।

अर्थ एवं महत्व

"बजरंग बाण" का अर्थ है "बजरंगबली का बाण" — जैसे धनुष से छूटा बाण सीधा लक्ष्य पर पहुँचता है, वैसे ही यह प्रार्थना भक्त की पुकार को सीधे हनुमान तक पहुँचाने वाली मानी जाती है। लोक-परंपरा में इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना माना जाता है, यद्यपि यह उनकी प्रामाणिक ग्रंथावली में सम्मिलित नहीं है। आरंभ में हनुमान के पराक्रम — समुद्र-लंघन, लंकिनी-वध, अशोक-वाटिका का विध्वंस और लंका-दहन — का स्मरण कर भक्त विलंब न करने की विनती करता है; मध्य भाग में बीजाक्षरों और श्रीराम व सीता की शपथ के साथ हनुमान का आग्रहपूर्ण आह्वान है। हनुमान चालीसा जहाँ स्तुति-प्रधान है, वहीं बजरंग बाण संकट में की गई आर्त पुकार है, इसलिए इसे प्रायः विशेष कठिनाई के समय, मंगलवार या शनिवार को, पूर्ण श्रद्धा और संयम के साथ पढ़ा जाता है।

दोहा और चौपाई छंद में, अवधी भाषा में; बीच-बीच में बीज-मंत्र (ॐ, ह्रीं, हुं आदि) सम्मिलित हैं।

लाभ

  • परंपरागत रूप से गंभीर संकट, भय और बाधाओं के समय हनुमान जी को पुकारने के लिए पढ़ा जाता है।
  • भक्त मानते हैं कि इसके पाठ से नकारात्मक शक्तियों और अनिष्ट से रक्षा होती है।
  • संकट की घड़ी में मन को साहस, धैर्य और भरोसा देने के लिए इसका पाठ किया जाता है।
  • मंगलवार और शनिवार को, विशेषकर हनुमान चालीसा के साथ, इसका पाठ शुभ माना जाता है।

पाठ विधि

स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और हनुमान जी के चित्र या मूर्ति के सामने दीपक व धूप जलाकर बैठें। पहले श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण करें, फिर एकाग्र मन से आरंभिक दोहे से लेकर समापन दोहे तक पूरा पाठ करें। परंपरा में इसे संयम और पवित्रता के साथ पढ़ने पर बल दिया जाता है; अनेक भक्त पहले हनुमान चालीसा और फिर बजरंग बाण पढ़ते हैं।

सामान्य प्रश्न

बजरंग बाण किसने लिखा?
लोक-परंपरा और अनेक मुद्रित संस्करणों में इसे गोस्वामी तुलसीदास की रचना बताया जाता है, किंतु यह उनकी प्रामाणिक ग्रंथावली में नहीं मिलता, इसलिए इसके रचयिता को लेकर विद्वानों में मतभेद है।
"बजरंग बाण" का क्या अर्थ है?
"बजरंग" हनुमान जी का नाम है (वज्र-अंग, अर्थात वज्र-समान शरीर वाले) और "बाण" का अर्थ है तीर — यानी हनुमान जी का बाण, जो सीधे लक्ष्य पर लगता है।
बजरंग बाण में कितनी चौपाइयाँ हैं?
यहाँ दिए गए प्रचलित पाठ में एक आरंभिक दोहा, ३४ चौपाइयाँ और एक समापन दोहा हैं; विभिन्न संस्करणों में कुछ पंक्तियों का क्रम और संख्या थोड़ी भिन्न हो सकती है।
बजरंग बाण का पाठ कब करना चाहिए?
इसे प्रायः गंभीर संकट या भय के समय, और विशेष रूप से मंगलवार या शनिवार को, स्वच्छता, संयम और एकाग्रता के साथ पढ़ा जाता है।
बजरंग बाण और हनुमान चालीसा में क्या अंतर है?
हनुमान चालीसा मुख्यतः हनुमान जी के गुणों की स्तुति है और प्रतिदिन पढ़ी जाती है, जबकि बजरंग बाण संकट में की गई आग्रहपूर्ण पुकार है, जिसमें बीज-मंत्र और शपथें सम्मिलित हैं।