वट सावित्री व्रत कथा
सावित्री-सत्यवान की कथा, बरगद पूजन की विधि, और 2026–2027 की तिथियाँ
वट सावित्री व्रत कथा की अगली संग्रहित तिथि शुक्रवार, 4 जून 2027 है। नीचे स्थान, परंपरा और स्रोत देखें; स्थानीय समय की पुष्टि करें।
संपादकीय परिचय — अद्यतन: 10 अक्टूबर 2026
इस परिचय में दी गई वर्ष-संबंधी जानकारी उस अद्यतन की है। आगामी तिथि के लिए ऊपर का उत्तर और नीचे की तिथि-सूची देखें।
वट सावित्री व्रत सुहागिन स्त्रियाँ पति की दीर्घायु के लिए ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) या ज्येष्ठ पूर्णिमा (वट पूर्णिमा — महाराष्ट्र, गुजरात, दक्षिण भारत) को बरगद की पूजा करके रखती हैं; यह उस सावित्री की स्मृति है जिसने यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस लिए।
व्रत की तिथियाँ
ये संग्रहित पर्व-तिथियाँ हैं। स्थानीय समय और अलग परंपराओं में अंतर संभव है; नीचे हर तिथि के संदर्भ देखें।
| तिथि (तारीख) | पर्व / तिथि |
|---|---|
शुक्रवार, 4 जून 2027 आगामी स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली, भारत उत्तर भारतीय अमावस्या परंपरा स्रोत से मिलान: 2026-10-10 | वट सावित्री अमावस्या — ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) |
शुक्रवार, 18 जून 2027 स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली, भारत वट पूर्णिमा परंपरा स्रोत से मिलान: 2026-10-10 | वट पूर्णिमा — ज्येष्ठ पूर्णिमा (महाराष्ट्र, गुजरात एवं दक्षिण भारत) |
सोमवार, 29 जून 2026 स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली, भारत वट पूर्णिमा परंपरा स्रोत से मिलान: 2026-10-10 | वट पूर्णिमा — ज्येष्ठ पूर्णिमा (महाराष्ट्र, गुजरात एवं दक्षिण भारत) |
शनिवार, 16 मई 2026 स्थान एवं स्रोतनई दिल्ली, भारत उत्तर भारतीय अमावस्या परंपरा स्रोत से मिलान: 2026-10-10 | वट सावित्री अमावस्या — ज्येष्ठ अमावस्या (उत्तर भारत) |
वट सावित्री व्रत कथा
यह कथा महाभारत के वन पर्व में आती है, जहाँ महर्षि मार्कण्डेय इसे युधिष्ठिर को सुनाते हैं। मद्र देश के धर्मात्मा राजा अश्वपति संतानहीन थे। उन्होंने अठारह वर्षों तक नियम-व्रत और देवी सावित्री की उपासना करते हुए यज्ञ किए। प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्विनी कन्या का वरदान दिया, और देवी के नाम पर ही कन्या का नाम सावित्री रखा गया।
सावित्री बड़ी हुई तो उसका रूप और तेज ऐसा था कि कोई राजकुमार उससे विवाह का प्रस्ताव लेकर आने का साहस न करता। तब पिता ने उसे स्वयं वर खोजने भेजा। लौटकर सावित्री ने बताया कि उसने शाल्व देश के राजा द्युमत्सेन के पुत्र सत्यवान को पति रूप में चुना है। द्युमत्सेन अंधे हो चुके थे और शत्रुओं द्वारा राज्य छीन लिए जाने के बाद पत्नी-पुत्र के साथ वन में आश्रम बनाकर रहते थे।
उसी समय वहाँ उपस्थित देवर्षि नारद ने कहा कि सत्यवान गुणों में अद्वितीय है, पर उसका एक ही दोष है — आज से ठीक एक वर्ष बाद उसकी मृत्यु हो जाएगी। राजा ने सावित्री से दूसरा वर चुनने को कहा, पर सावित्री ने दृढ़ता से कहा कि कन्यादान एक ही बार होता है और वह मन से सत्यवान को वर चुकी है। उसका निश्चय देखकर विवाह हो गया और सावित्री राजसी वस्त्र त्यागकर पति और सास-ससुर की सेवा करती हुई वन के आश्रम में रहने लगी।
वह मन ही मन नारद के बताए दिन गिनती रही। जब सत्यवान की मृत्यु में तीन दिन शेष रहे, तो उसने तीन दिन-रात का कठोर व्रत लिया — अन्न-जल त्यागकर वह दिन-रात खड़ी रही। निश्चित दिन जब सत्यवान लकड़ी काटने वन जाने लगा, तो सावित्री भी सास-ससुर से आज्ञा लेकर उसके साथ चल दी। लकड़ी काटते हुए सत्यवान के सिर में तीव्र पीड़ा हुई और वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया। लोक-परंपरा के अनुसार वह स्थान एक विशाल वट (बरगद) वृक्ष की छाया थी।
तभी लाल वस्त्र पहने, हाथ में पाश लिए स्वयं यमराज प्रकट हुए और सत्यवान के अँगूठे जितने सूक्ष्म प्राण खींचकर दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े। सावित्री भी उनके पीछे चल दी। यमराज ने उसे लौट जाने को कहा, पर सावित्री धर्म, सज्जनों की मैत्री और पतिव्रत पर ऐसी ज्ञानपूर्ण बातें कहती रही कि यमराज प्रसन्न हो गए और सत्यवान के जीवन को छोड़कर कोई भी वर माँगने को कहा।
सावित्री ने पहले वर में अपने अंधे ससुर की आँखों की ज्योति और बल माँगा; दूसरे में उनका छिना हुआ राज्य; तीसरे में अपने पिता अश्वपति के लिए सौ पुत्र। यमराज सब देते गए, पर सावित्री फिर भी पीछे-पीछे चलती रही। अंत में उसने माँगा कि उसे सत्यवान से सौ पुत्र हों। यमराज ने "तथास्तु" कह दिया — और तब सावित्री ने विनम्रता से कहा कि पति के बिना यह वर कैसे पूरा होगा? अपने ही वचन से बँधे यमराज ने सत्यवान के प्राण लौटा दिए और दोनों को दीर्घायु का आशीर्वाद दिया।
सावित्री उसी वट वृक्ष के नीचे लौटी जहाँ सत्यवान का शरीर था, और सत्यवान ऐसे उठ बैठा मानो गहरी नींद से जागा हो। आश्रम लौटने पर उन्होंने पाया कि द्युमत्सेन की आँखों की ज्योति लौट आई है, और शीघ्र ही उनका राज्य भी उन्हें वापस मिल गया। तभी से सुहागिन स्त्रियाँ सावित्री के इस अटूट साहस और निष्ठा की स्मृति में ज्येष्ठ मास में वट वृक्ष की पूजा कर यह व्रत रखती हैं।
व्रत एवं पूजा विधि
1. परंपरा में यह व्रत तीन दिन (त्रयोदशी से अमावस्या/पूर्णिमा तक) का है, पर आजकल अधिकतर स्त्रियाँ मुख्य तिथि के दिन ही व्रत रखती हैं। प्रातः स्नान कर श्रृंगार करें और पति की दीर्घायु के लिए व्रत का संकल्प लें।
2. पूजा-सामग्री तैयार करें — जल का कलश, रोली, हल्दी, अक्षत, पुष्प, कच्चा सूत (कलावा), भीगे काले चने, फल, मिठाई, धूप-दीप, बाँस का पंखा, और सावित्री-सत्यवान का चित्र या प्रतिमा।
3. वट (बरगद) वृक्ष के पास जाकर उसकी जड़ में जल अर्पित करें। सावित्री-सत्यवान और यमराज का ध्यान कर रोली, हल्दी, अक्षत, पुष्प, फल और भीगे चने अर्पित करें; धूप-दीप जलाएँ।
4. कच्चा सूत या कलावा लेकर वृक्ष के तने पर लपेटते हुए परिक्रमा करें — प्रायः 7 बार, कुछ स्त्रियाँ 11, 21 या 108 बार।
5. वृक्ष के नीचे बैठकर वट सावित्री व्रत कथा पढ़ें या सुनें। बाँस के पंखे से वृक्ष और सावित्री-सत्यवान को हवा करने की भी परंपरा है।
6. पूजा के बाद भीगे चने, वस्त्र और दक्षिणा का बायना सास को देकर उनका आशीर्वाद लें। परंपरा के अनुसार वट वृक्ष की कोंपल और भीगे चने ग्रहण कर व्रत खोला जाता है; कई क्षेत्रों में अगले दिन पारण होता है।
सामान्य प्रश्न
- वट सावित्री व्रत 2026 और 2027 में कब है?
- द्रिकपंचांग (नई दिल्ली) के अनुसार अमावस्या वाला वट सावित्री व्रत 2026 में शनिवार, 16 मई को था और 2027 में शुक्रवार, 4 जून को है। पूर्णिमा वाला वट पूर्णिमा व्रत 2026 में सोमवार, 29 जून को था और 2027 में शुक्रवार, 18 जून को है।
- वट सावित्री अमावस्या और वट पूर्णिमा में क्या अंतर है?
- दोनों एक ही व्रत हैं, बस तिथि क्षेत्रीय पंचांग के अनुसार बदलती है। पूर्णिमांत पंचांग वाले उत्तर भारत (उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, ओडिशा आदि) में यह ज्येष्ठ अमावस्या को, और अमांत पंचांग वाले महाराष्ट्र, गुजरात व दक्षिण भारत में ज्येष्ठ पूर्णिमा को "वट पूर्णिमा" के रूप में रखा जाता है।
- 2026 में वट सावित्री अमावस्या और वट पूर्णिमा के बीच छह सप्ताह का अंतर क्यों था?
- सामान्यतः वट पूर्णिमा अमावस्या वाले व्रत के लगभग 15 दिन बाद आती है। 2026 में ज्येष्ठ अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) पड़ा, इसलिए वट पूर्णिमा निज ज्येष्ठ की पूर्णिमा, 29 जून को मनाई गई। 2027 में अंतर फिर सामान्य (4 जून और 18 जून) है।
- वट सावित्री व्रत में बरगद की पूजा क्यों होती है?
- लोक-परंपरा के अनुसार सावित्री ने बरगद के नीचे ही यमराज से सत्यवान के प्राण वापस पाए थे। साथ ही वट वृक्ष को दीर्घायु और अक्षयता का प्रतीक माना जाता है, और मान्यता है कि उसकी जड़ में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में शिव का वास है।
- सावित्री-सत्यवान की कथा मूल रूप से कहाँ से है?
- यह कथा महाभारत के वन पर्व के "पतिव्रता माहात्म्य" (सावित्री उपाख्यान) में है, जिसे महर्षि मार्कण्डेय ने युधिष्ठिर को सुनाया था। इसका उल्लेख कुछ पुराणों में भी मिलता है। व्रत के दिन पढ़ी जाने वाली कथा इसी का सरल रूप है।